प्रभु श्री राम राजसिंहासन पर विराजमान हैं। सखियाँ उनकी शोभा का वर्णन कर रही हैं। इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना :——-
शोभा बरनी न जाई रघुबीर सखी ।
नील कमल सम श्यामल गाता ,
सरसिज लोचन भृकुटि विलासा ,
चारु नासिका कीर सखी ।
शोभा बरनी न जाई………..
कुंचित कच जनु मधुप विराजत ,
कोटिश कामदेव छवि राजत ,
अंग अंगनि रचि रुचिर सखी ।
शोभा बरनी न जाई………..
पुष्ट कंध उर भुजा विशाला ,
भाल तिलक सुन्दर मनि माला ,
त्रिवली नाभि गँभीर सखी ।
शोभा बरनी न जाई………..
पीत बसन उपबीत सुहावन ,
धनु शारंग कंध अति पावन ,
कटि तट कसे तुनीर सखी ।
शोभा बरनी न जाई………..
बिधि शंकर नित देखन आवत ,
बरनत शोभा पार न पावत ,
निगम शारदा शेष सखी ।
शोभा बरनी न जाई………..
गात = शरीर , सरसिज = कमल ,
कीर = तोता , कुंचित कच = काले घुँघराले बाल ,
मधुप = भँवरा , त्रिवली = उदर पर बनी तीन रेखाएँ ,
उपबीत = जनेऊ , तुनीर = तरकस , निगम = वेद
रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

