– पूर्णेन्दु पुष्पेश मैं कलाकार हूं। इसलिए जब कोई मुझसे पूछता है कि झारखंड में कलाकारों के लिए क्या हो रहा है, तो मेरे पास…
View More ‘अंडर प्रोसेस’ में अटका झारखंडी कलाकारों का भविष्यCategory: EDITORIAL
भारत अब सिर्फ खरीदार नहीं, बदल रहा अपना किरदार
– पूर्णेन्दु पुष्पेश कभी भारत की चर्चा होती थी तो दो बातें सबसे पहले सामने आती थीं- ‘बड़ी आबादी और बड़ा बाजार’। यानी दुनिया के…
View More भारत अब सिर्फ खरीदार नहीं, बदल रहा अपना किरदारदेश की सीमा नक्शे पर है, राष्ट्र की सीमा जनता के भीतर
– Purnendu Pusshpesh किसी देश की पहचान सबसे पहले उसके नक्शे से होती है। सीमाएं तय करती हैं कि यह जमीन यहां से शुरू होती…
View More देश की सीमा नक्शे पर है, राष्ट्र की सीमा जनता के भीतरलोकतंत्र में सवाल जरूरी हैं, भरोसा भी
– Purnendu Pusshpesh लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है। सवाल नहीं होंगे तो सत्ता जवाबदेह कैसे रहेगी और विपक्ष अपनी भूमिका कैसे निभाएगा? सरकार की…
View More लोकतंत्र में सवाल जरूरी हैं, भरोसा भीयुवा सोच को निशाना बनाता डिजिटल दुष्प्रचार
– पूर्णेन्दु पुष्पेश देश की सुरक्षा का मोर्चा अब केवल सीमा तक सीमित नहीं है। सीमा पर जवान दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखता है,…
View More युवा सोच को निशाना बनाता डिजिटल दुष्प्रचारदूसरों के आंसू भी हमारे हिस्से का सवाल हैं
– पूर्णेन्दु पुष्पेश अपने दुख को समझना आसान है, क्योंकि उसकी चोट हमें लगती है। मुश्किल यह है कि हम दूसरे के दर्द को भी…
View More दूसरों के आंसू भी हमारे हिस्से का सवाल हैंअंत्योदय से विकसित भारत तक विकास की असली कसौटी
– पूर्णेन्दु पुष्पेश अंत्योदय की बात वहीं से शुरू होती है, जहां विकास की चमक सबसे कम दिखाई देती है। समाज का वह व्यक्ति, जो…
View More अंत्योदय से विकसित भारत तक विकास की असली कसौटीअसहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन सम्मान उसकी मर्यादा
– पूर्णेन्दु पुष्पेश लोकतंत्र की ताकत इस बात में है कि सरकार से सवाल पूछे जा सकते हैं और असहमति खुलकर दर्ज की जा सकती…
View More असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन सम्मान उसकी मर्यादापुलिस को मजबूत किए बिना मजबूत भारत की कल्पना अधूरी
– editorial by Purnendu Pusshpesh भारत को विकसित और सुरक्षित राष्ट्र बनाना है तो पुलिस को केवल कानून लागू करने वाली ताकत के रूप में…
View More पुलिस को मजबूत किए बिना मजबूत भारत की कल्पना अधूरीजहां भाव चाहिए, वहां हम भाव लगाने बैठे हैं
– Purnendu Pusshpesh हमारे समय की एक अजीब आदत हो गई है। हम हर चीज का हिसाब लगाने लगे हैं। किससे कितना फायदा हुआ, किसने…
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