हनुमान जी जब लंका की अशोक वाटिका में माता सीता से मिले तब सीता जी अपनी विरह वेदना हनुमान जी से व्यक्त करने लगीं । इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना :——-
कहु कपि कब ऐहैं रघुबीर ।
किय मोरि सुधि कभी लिन्हिं पति,
किय मोहे नाथ बिसराय दियो कपि,
कब हरिहैं मोरे पीर ।
कहु कपि कब ऐहैं……………..
कब देखिहौं राजीव नयन को,
बरसत लोचन स्वामि अयन को,
जरत बिरह में शरीर ।
कहु कपि कब ऐहैं……………..
राख्यो प्रान एही असरन्ह कपि,
ऐहैं एक दिन मोरे प्रानपति,
साखी अनल समीर ।
कहु कपि कब ऐहैं……………..
रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

