संवरता झारखण्ड: सुरक्षा, जल और स्वास्थ्य में समन्वित विकास की नई पटकथा

– पूर्णेन्दु पुष्पेश 

झारखण्ड लंबे समय तक संसाधनों से समृद्ध लेकिन संरचनात्मक चुनौतियों से जूझता राज्य माना जाता रहा है। खनिज संपदा, जल संसाधन और युवा जनसंख्या होने के बावजूद बुनियादी ढांचे, प्रशासनिक दक्षता और सेवा वितरण में कई कमियां रहीं। लेकिन हाल के महीनों में जिस तरह सुरक्षा, पेयजल और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत क्षेत्रों में ठोस और वित्तीय रूप से समर्थ निर्णय लिए गए हैं, उससे यह संकेत स्पष्ट है कि राज्य प्रशासन विकास की दिशा में गंभीर और सक्रिय है। केंद्र के सहयोग और राज्य सरकार की इच्छाशक्ति के संयोजन ने झारखण्ड को एक नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का अवसर दिया है। सच कहा जाए तो झारखण्ड अब केवल योजनाएं घोषित करने वाला राज्य नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने की तत्परता दिखाने वाला राज्य बनता दिख रहा है।

सबसे पहले कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक दक्षता की बात। राज्य पुलिस द्वारा 893 आधुनिक वायरलेस उपकरणों की खरीद का निर्णय केवल तकनीकी उन्नयन नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं का संकेत है। आज के दौर में सुरक्षा तंत्र की प्रभावशीलता केवल बल की संख्या पर नहीं, बल्कि संचार की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। कई थानों में अभी भी पुराने एनालॉग सिस्टम का उपयोग हो रहा था, जिससे संदेशों की स्पष्टता, नेटवर्क स्थिरता और प्रतिक्रिया समय प्रभावित होता था। आपात स्थितियों; चाहे वह अपराध नियंत्रण हो, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अभियान हो, प्राकृतिक आपदा हो या भीड़ प्रबंधन, इन सभी में तेज और सुरक्षित संचार अनिवार्य है।

इस संदर्भ में 164 वायरलेस इंटरसेप्टर, 134 डिजिटल वैरी हाई फ्रीक्वेंसी बेस सेट, 405 डिजिटल हैंड सेट और 10 स्टैटिक हाई फ्रीक्वेंसी ट्रांसीवर की प्रस्तावित खरीद पुलिस बल को जमीनी स्तर तक तकनीकी रूप से सक्षम बनाएगी। महत्वपूर्ण यह भी है कि खरीद प्रक्रिया को एडीजी आधुनिकीकरण की अध्यक्षता में बहु-सदस्यीय समिति के माध्यम से पारदर्शी और तकनीकी मानकों के अनुरूप रखा गया है। वित्त, उद्योग और निगरानी विभाग की भागीदारी यह दर्शाती है कि सरकार केवल उपकरण खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित करना चाहती है। यह प्रशासनिक परिपक्वता का संकेत है।

सुरक्षा के समानांतर यदि जीवन की बुनियादी आवश्यकता ‘पानी’की बात करें तो पेयजल एवं स्वच्छता विभाग को 2800 करोड़ रुपये से अधिक की स्वीकृति मिलना झारखण्ड के लिए मील का पत्थर है। बोकारो, गढ़वा और साहिबगंज की शहरी जलापूर्ति योजनाएं लंबे समय से गति की प्रतीक्षा में थीं। धन की उपलब्धता के बाद इन परियोजनाओं को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है। जिन योजनाओं का 70 प्रतिशत से अधिक कार्य पूरा हो चुका है, उन्हें दो महीने में पूरा करने का लक्ष्य बताता है कि अब कार्यान्वयन पर फोकस है।

यह पहल व्यापक राष्ट्रीय कार्यक्रम जल जीवन मिशन से भी जुड़ी है, जिसके तहत राज्य में 65 लाख घरों तक नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। वर्तमान में 35 लाख घरों तक जलापूर्ति पहुंचना निश्चित ही उपलब्धि है, लेकिन लक्ष्य का आधा रास्ता अभी बाकी है। 263 प्रखंडों और 4296 पंचायतों में योजना का विस्तार प्रशासनिक दृष्टि से जटिल कार्य है। 122 गांवों तक योजना न पहुंच पाना यह संकेत देता है कि भौगोलिक और संरचनात्मक चुनौतियां अभी शेष हैं। फिर भी आगामी वित्त वर्ष में 3000 करोड़ रुपये की संभावित केंद्रीय सहायता यह दर्शाती है कि संसाधन की कमी अब विकास की राह में प्रमुख बाधा नहीं रहेगी।

यहां जियो टैगिंग की अनिवार्यता उल्लेखनीय है। 80 प्रतिशत घरों की जियो टैगिंग होना पारदर्शिता और निगरानी के प्रति गंभीरता का संकेत है। जब योजनाएं डिजिटल ट्रैकिंग से जुड़ती हैं तो कागजी खानापूर्ति की गुंजाइश कम होती है। यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक इच्छाशक्ति और तकनीकी साधन मिलकर सुशासन की आधारशिला रखते हैं।

अब स्वास्थ्य क्षेत्र की ओर रुख करें। मुख्यमंत्री अस्पताल कायाकल्प योजना के तहत सदर अस्पतालों के जीर्णोद्धार और मेडिकल कॉलेजों के विस्तार को मिली स्वीकृति झारखण्ड के सामाजिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। गोड्डा और दुमका सदर अस्पतालों के लिए क्रमशः 4.05 करोड़ और 5.26 करोड़ रुपये की स्वीकृति केवल भवन मरम्मत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधार का प्रयास है। लंबे समय से जिला अस्पतालों की स्थिति यह रही है कि मरीजों को छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए बड़े शहरों की ओर जाना पड़ता था।

रांची सदर अस्पताल में बोन मैरो स्टेम सेल ट्रांसप्लांट यूनिट की स्थापना का निर्णय राज्य के स्वास्थ्य इतिहास में एक बड़ा कदम है। गंभीर रक्त संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए अब तक मरीजों को दिल्ली, मुंबई या कोलकाता जैसे शहरों का रुख करना पड़ता था। स्थानीय स्तर पर यह सुविधा उपलब्ध होने से न केवल आर्थिक बोझ घटेगा, बल्कि उपचार की पहुंच भी बढ़ेगी।

मेडिकल शिक्षा और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए धनबाद स्थित शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज में नए पीजी ब्लॉक और ओपीडी ब्लॉक का निर्माण 24.95 करोड़ रुपये की लागत से किया जाना भी दूरगामी प्रभाव डालेगा। जी प्लस थ्री, जी प्लस फोर और जी प्लस फाइव संरचना वाले भवनों का निर्माण यह दर्शाता है कि योजना केवल तात्कालिक आवश्यकता नहीं, बल्कि भविष्य की बढ़ती मांग को ध्यान में रखकर बनाई गई है। पलामू के मेदिनीराय मेडिकल कॉलेज में उपकरण खरीद के लिए 1.50 करोड़ रुपये की स्वीकृति से क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने का संकेत मिलता है।

सुरक्षा, जल और स्वास्थ्य – इन तीनों क्षेत्रों में एक समान तत्व स्पष्ट है: वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता के साथ संस्थागत ढांचे को मजबूत करना। यह विकास का समन्वित मॉडल है, जहां कानून-व्यवस्था नागरिकों को सुरक्षित वातावरण देती है, पेयजल स्वास्थ्य जोखिमों को कम करता है और मजबूत अस्पताल व्यवस्था जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ये पहलें जमीन पर पूरी तरह उतर पाएंगी? झारखण्ड का अतीत बताता है कि कई बार परियोजनाएं घोषणा और स्वीकृति तक सीमित रह गईं। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में कुछ बदलाव दिख रहे हैं। बहु-विभागीय समितियां, जियो टैगिंग, तकनीकी स्वीकृति, डीपीआर की पारदर्शिता और केंद्र-राज्य समन्वय यह संकेत देते हैं कि प्रशासन अब प्रक्रियात्मक मजबूती पर ध्यान दे रहा है।

झारखण्ड की कार्यपालिका की परीक्षा यहीं से शुरू होती है। योजनाओं की सफलता केवल बजट आवंटन से नहीं, बल्कि समयबद्ध क्रियान्वयन, गुणवत्ता नियंत्रण और सामाजिक निगरानी से तय होती है। यदि पुलिस वायरलेस सिस्टम समय पर स्थापित होते हैं, यदि हर घर नल योजना के शेष 30 लाख घरों तक पानी वास्तव में पहुंचता है, यदि अस्पतालों के भवनों के साथ मानव संसाधन और उपकरण भी समान गति से उपलब्ध होते हैं. …तभी इन पहलों का वास्तविक अर्थ सामने आएगा।

हालांकि वर्तमान संकेत सकारात्मक हैं। प्रशासनिक स्तर पर तत्परता, समीक्षा बैठकों की सक्रियता और डिजिटल निगरानी की प्रवृत्ति यह आश्वस्त करती है कि परियोजनाएं केवल कागजी खानापूर्ति बनकर नहीं रह जाएंगी। केंद्र के सहयोग और राज्य सरकार की इच्छाशक्ति का यह संयोजन यदि इसी तरह बना रहा, तो झारखण्ड विकास की उस राह पर आगे बढ़ सकता है जहां संसाधनों का लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचे।

अंततः, झारखण्ड का भविष्य केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि धरातल पर दिखने वाले परिवर्तन से तय होगा। अभी जो संकेत मिल रहे हैं, वे आशावादी हैं। यदि यही गति और पारदर्शिता बनी रही, तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि झारखण्ड सचमुच संवर रहा है, निखर रहा है और प्रशासन विकास को कागज से जमीन तक ले जाने के लिए पहले से अधिक प्रतिबद्ध दिखाई दे रहा है।

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