दोबारा भरोसा या नई शुरुआत? चास की जनता के सामने विकल्प


— पूर्णेन्दु ‘पुष्पेश’

चास नगर निगम चुनाव इस बार सत्ता लोलुपता की सीमाएँ पार कर रहा है। 30 से ज्यादा नए-पुराने घड़े अपनी चमक दिखाने को उद्वेलित हैं। जो विगत चुनाव में जीते थे, उनके मुंह में अभी तक खून का स्वाद बाकी है और जो एन-केन-प्रकारेण पुनः गद्दी पर फिर स्थापित होना चाहते हैं। गद्दी की पुरानी गर्मी प्रचार के दौरान भी दिख ही जाती है। अतिआत्मविश्वास से लबरेज़ इनका कारवां राजरथ की मानिंद भ्रमण कर रहा है। वहीं कुछ तथाकथित स्त्री-पुरुष नेता, जो दशकों से कोई चुनाव नहीं जीते, समय-समय पर अनेक राजनीतिक पार्टियों में अपना भविष्य तलाशते रहे, विचरते रहे; एक बार फिर दांव लगाने सामने आ गए हैं। इन सबका नाम लेने की आवश्यकता इसलिए नहीं है क्योंकि चास नगर निगम की जनता इन सबको खूब पहचानती है और दोबारा मौका देने को कतई तैयार नहीं दिख रही।

वहीं कई नए चेहरे, चाहे महत्वाकांक्षा में, चाहे सेवाभाव से, मेयर बनने मैदान में उतरे हैं। कुछ पत्रकार भी अपने आपको ‘नामचीन पत्रकार’ मानकर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वहीं कुछ राजनीति में अपना करियर बनाना चाहते हैं।

जहां एक ओर महत्वाकांक्षियों का जमावड़ा है, वहीं यह मुकाबला युवा उत्साह और अनुभवी समझ के संगम के रूप में देखा जा रहा है। चास के इस मेयर चुनाव में धनवर्षा भी आधिकारिक और अनाधिकारिक रूप से हो ही रही है। जिसके भाग्य में जो है, पा ही ले रहा है। अगर कोई ‘कागज़’ से ‘सही है’, तो प्रशासन भी कहां-कहां और कितनी दबिश दे पाएगा, समझा जा सकता है। खैर, अब डिप्लोमैटिक तरीके से कहा जाए तो—चास के चुनावी मैदान में 34 से 65 वर्ष तक के प्रत्याशी उतरकर यह संदेश दे रहे हैं कि लोकतंत्र में हर पीढ़ी की भागीदारी अहम है।

34 साल की निधि कुमारी को युवा सपने मैदान में ले आए हैं, तो 65 साल के गोपाल मुरारका भी पूरी मजबूती से डटे हैं। गोपाल मुरारका का विश्वास है कि ‘सब के सब व्यवसायी’ उनको ही वोट देंगे। पूर्व मेयर भोलू पासवान खुद पर ‘दोबारा विश्वास’ करवाने को एड़ियां रगड़ रहे हैं, वहीं विनोद कुमार जनता में अपने प्रति उत्साह देखकर फूले नहीं समा रहे हैं।

दसियों पार्टी बदलने वाले मोहम्मद सुलतान और रीतू रानी चास की जनता को फुसलाने में व्यस्त हैं। भाजपा समर्थित अविनाश कुमार ‘नई आशाओं—नई उम्मीदों’ के साथ चुनाव लड़ तो रहे हैं और चास में मौके पर ही राष्ट्रवाद पसरा तो क्या पता जीत भी जाएं; लेकिन क्या पूर्व मेयर भोलू का साथी रहना, वह भी उपमेयर रूप में, चास की जनता को कितना जमता है—कहा नहीं जा सकता। वैसे भी अंदरखाने कुछ तो अनहोनी की आशंका है। चास नगर निगम चुनाव को लेकर सियासी गलियारों में हलचल तेज है। प्रत्याशियों के खेमे में अंदरखाने मंथन और रणनीति बैठकों का दौर बढ़ गया है, जिससे अटकलों का बाजार गर्म है कि क्या वाकई झंडाधारियों की चिंता बढ़ रही है?

बाकी बचे सभी प्रत्याशी अपनी-अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे हैं और ‘उम्मीद’ जगाने में लगे हैं। युवा उम्र के प्रत्याशी बता रहे हैं कि उनके पास “नई सोच” है। प्रौढ़ प्रत्याशी बता रहे हैं कि “बहुत देखा है।” कुल 31 प्रत्याशियों में अधिकांश 40 से 55 के बीच हैं, यानी अनुभव और ऊर्जा दोनों एक साथ मैदान में आमने-सामने हैं।

जिनके नामों की चर्चा नहीं हुई, उनमें दम नहीं है—ऐसा भी नहीं है। किन्तु इनमें अधिकांश को जनता या तो जानती ही नहीं, या फिर जिन्हें जनता जानती है, उनकी औकात कितनी है। कुछ भी हो, ‘वोट-कटवा’ की भूमिका निभाने वाले इनमें काफी निकलकर आएंगे, जो संभावित मेयर के लिए राह कंटकपूर्ण और कष्टपूर्ण बना ही देंगे।

भोलू का भाग्य बली रहा और जनता ने माफ कर दिया, तो संभावना बनती है। अविनाश कुमार पर क्षेत्र कृपा से ज्यादा राष्ट्र कृपा जीत का कारण बनेगी। बोकारो में विधानसभा चुनाव में भाजपा नकार दी गई थी। अगर भाजपा विधायक के प्रति कुभावना अब भी जनता में बाकी रही होगी, तब उनका अविनाश कुमार का प्रचार करना धनात्मक असर पैदा नहीं ही करेगा।

विनोद कुमार की भी संभावना बनती है, किन्तु ऊपर के दोनों को वोटकटवा अपने जाल में फंसा लें तो। इस अवस्था में तो गोपाल मुरारका का कांटा भी ऊपर चढ़ सकता है। बाकी तो बस मेला लगाने आए दीखते हैं।

हालांकि, जीत के लिए एक अवस्था/व्यवस्था और बाकी है। वह यह कि किस धनाढ्य ने कितने प्रत्याशियों को अपने पक्ष में बैठ जाने को मजबूर कर लिया है।

अब निर्णय मतदाताओं के हाथ में है कि वे किस सोच और नेतृत्व शैली को चास के भविष्य के लिए उपयुक्त मानते हैं। नए को मौका देते हैं या पुरानी चक्की में फिर से पीसना चाहते हैं।