– पूर्णेन्दु पुष्पेश
बताते चलूँ कि मैं एक सरकारी विभाग में कार्यरत हूँ; वह भी ऐसा विभाग जहाँ काम कम और “काम का दबाव” ज्यादा होता है। सुबह ऑफिस जाओ तो फाइलें मुंह बाए खड़ी रहती हैं और शाम को घर लौटो तो परिवार के सदस्य ऐसे घूरते हैं मानो मैं दफ्तर नहीं, पिकनिक मनाकर लौटा हूँ। ऊपर से साहब की डांट, नीचे से बाबुओं की चालाकी, और बीच में मैं…..एकदम “सरकारी सैंडविच”।
इन्हीं सब समस्याओं से त्रस्त होकर एक दिन मैंने तय किया कि अब बस! जिंदगी को “रीसेट” करना होगा। और रीसेट का सबसे सस्ता और सुलभ तरीका क्या है? डॉक्टर! सो मैं सीधे डॉक्टर साहब के क्लिनिक जा पहुँचा।
क्लिनिक में पहुंचते ही मैंने बिना नंबर के ही अंदर घुसने की कोशिश की, क्योंकि सरकारी कर्मचारी होने के नाते मुझे “लाइन में लगना” थोड़ा असंवैधानिक लगता है। अंदर पहुँचते ही कुर्सी पर धम्म से बैठा और शुरू हो गया, “डॉक्टर साहब, मुझे कोई ऐसी दवा दीजिए कि सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएं। ऑफिस में साहब जान खा रहे हैं, घर में पत्नी ताने दे रही है, बच्चे मुझे एटीएम समझते हैं और मोहल्ले वाले तो ऐसे देखते हैं जैसे मैं ही देश की अर्थव्यवस्था बिगाड़ने का जिम्मेदार हूँ।”
डॉक्टर साहब चुपचाप मेरी बातें सुनते रहे। बीच-बीच में “हूँ”, “अच्छा” और “फिर?” जैसे शब्दों का प्रयोग करते रहे, जिससे मुझे लगा कि वे मेरी पीड़ा को गंभीरता से ले रहे हैं। लेकिन सच कहूँ तो मुझे बोलने में इतना मजा आ रहा था कि अगर वे बीच में रोकते भी तो मैं नहीं रुकता।
मैंने अपनी पूरी रामकथा सुना डाली- कैसे ऑफिस में एक फाइल तीन-तीन महीने तक घूमती है, कैसे साहब हर मीटिंग में “काम में तेजी लाओ” का भाषण देते हैं, और कैसे घर में मेरी पत्नी हर महीने “तुम्हारी सैलरी इतनी कम क्यों है?” का ऑडिट करती है।
लगभग आधे घंटे तक लगातार बोलने के बाद जब मेरा गला सूख गया, तब डॉक्टर साहब ने पानी का गिलास मेरी ओर बढ़ाया और मुस्कुराते हुए बोले-“भाई, आप पुलिसकर्मियों का दर्द नहीं समझ सकते।”
मैं थोड़ा चौंका। सोचा-“अरे! मैं अपनी समस्या लेकर आया हूँ, और ये पुलिस की कहानी सुना रहे हैं?” लेकिन अब तक मैं इतना बोल चुका था कि जवाब में कुछ सुनना भी मेरी जिम्मेदारी बनती थी।
डॉक्टर साहब ने चश्मा ठीक किया और बोले….
“आप आठ घंटे की नौकरी से परेशान हैं, वे चौबीस घंटे की जिंदगी जीते हैं… जिसमें ‘ड्यूटी’ नाम का राक्षस हर समय सिर पर सवार रहता है।”
मैं चुप हो गया। अब डॉक्टर साहब पूरी गति में थे-
“आपको कभी-कभी साहब की डाँट सुननी पड़ती है। उन्हें हर समय सुननी पड़ती है….ऊपर से भी, नीचे से भी और बीच-बीच में जनता से भी। उनके लिए ‘ऑफ डे’ नाम की चीज़ सिर्फ सरकारी फाइलों में होती है। घर में बैठते ही फोन आ जाएगा- “तुरंत थाने पहुँचिए।”…….. “देखिए, पुलिस वालों की जिंदगी में ‘ऑफिस टाइम’ नाम की कोई चीज नहीं होती। 24 घंटे की ड्यूटी, और छुट्टी मिली तो चार दिन का आराम….वह भी अगर कोई नया बवाल न हो जाए तो। उन्हें खुद नहीं पता होता कि कब सोना है और कब जागना है। कुर्सी पर बैठते हैं तो वायरलेस बज उठता है- “तुरंत निकलो”। घर में खाना खा रहे हों तो फोन- “सर, घटना हो गई है”। अब बताइए, यह जिंदगी है या ‘रियलिटी शो’?”
“ऊपर से सीनियर का दबाव….चाहे आदेश व्यावहारिक हो या अव्यावहारिक, पालन करना ही है। नीचे अपराधी; जो हर समय नई स्कीम लेकर तैयार रहते हैं। और बीच में जनता….जिसकी घरेलू खिचखिच भी पुलिस ही सुलझाए। पति-पत्नी का झगड़ा हो, पड़ोसी का विवाद हो, या गाय का बछड़ा खो जाए -सब पुलिस के जिम्मे।”
मैंने हल्की-सी हामी भरी, पर डॉक्टर साहब रुके नहीं-
“सोचिए, एक पुलिसकर्मी कब सोता है? उसे खुद नहीं पता। खाना कब खाता है? यह भी तय नहीं। त्यौहार? वो क्या होता है? दिवाली में पटाखे नहीं, वायरलेस बजता है। होली में रंग नहीं, भीड़ नियंत्रण होता है। ईद में सेवइयाँ नहीं, सुरक्षा ड्यूटी होती है।”
अब मेरी शिकायतें धीरे-धीरे शर्माने लगी थीं।
डॉक्टर साहब आगे बोले – “और जनता… जनता तो उन्हें ‘ऑल इन वन’ समझती है। कहीं पति-पत्नी का झगड़ा हो गया -पुलिस बुलाओ। पड़ोसी की बकरी खेत में घुस गई -पुलिस बुलाओ। मोबाइल खो गया -पुलिस बुलाओ। शादी में डीजे तेज बज रहा -पुलिस बुलाओ। जैसे पुलिस नहीं, ‘होम सर्विस ऐप’ हो!”
मैं अनायास हँस पड़ा, लेकिन वह हँसी थोड़ी कड़वी थी।
“और मीडिया…” डॉक्टर साहब ने लंबी सांस ली,
“वो हर समय तैयार रहता है। अगर पुलिस ने कुछ नहीं किया तो भी खबर, और अगर कुछ कर दिया तो भी खबर। ‘पुलिस सो रही थी’ या ‘पुलिस ने ज्यादा कर दिया’….दोनों ही हेडलाइन बनती हैं।”
अब मुझे लगा कि मेरी परेशानी सच में छोटी है।
“ऊपर से अपराधी…” डॉक्टर साहब ने स्वर धीमा किया,
“जो कानून से नहीं, मौके से चलते हैं। और पुलिसकर्मी उनके पीछे अपनी जान जोखिम में डालकर भागता है। कई बार घर से निकलता है तो यह भी तय नहीं होता कि शाम को वापस आएगा या नहीं।”
मेरे चेहरे की मुस्कान अब पूरी तरह गायब थी।
“और सबसे बड़ी बात…” डॉक्टर साहब ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा,
“वह इंसान होते हुए भी ‘इंसान’ नहीं रह पाता। उसे हर समय वर्दी में रहना पड़ता है, भले ही वह घर में हो या बाजार में। उसकी पहचान, उसकी आज़ादी, उसकी थकान … सब वर्दी के अंदर कैद हो जाती है।”
कमरे में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।
मैंने धीरे से पूछा- “तो डॉक्टर साहब, उनकी दवा क्या है?”
डॉक्टर साहब हल्के से मुस्कुराए-
“दवा? उनकी दवा कोई मेडिकल स्टोर में नहीं मिलती। उनकी दवा है -सम्मान, सहयोग और थोड़ा-सा मानवीय व्यवहार।”
मैं कुर्सी से उठने लगा। मेरे चेहरे पर अब वैसी बेचैनी नहीं थी।
डॉक्टर साहब ने पीछे से आवाज दी…
“और हाँ, आपकी दवा भी यही है -थोड़ा नजरिया बदल लीजिए, जिंदगी खुद-ब-खुद हल्की लगने लगेगी।”
मैं बाहर निकला। सड़क पर एक पुलिसकर्मी खड़ा था…धूप में, पसीने से तर, ट्रैफिक संभालता हुआ।
पहली बार मैंने उसे ध्यान से देखा… और मन ही मन सोचा-
“सच में, हम सब अपनी-अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में उलझे हैं, लेकिन इनकी परीक्षा सबसे कठिन है… और परीक्षक भी सबसे कठोर।”
– पूर्णेन्दु पुष्पेश
बताते चलूँ कि मैं एक सरकारी विभाग में कार्यरत हूँ; वह भी ऐसा विभाग जहाँ काम कम और “काम का दबाव” ज्यादा होता है। सुबह ऑफिस जाओ तो फाइलें मुंह बाए खड़ी रहती हैं और शाम को घर लौटो तो परिवार के सदस्य ऐसे घूरते हैं मानो मैं दफ्तर नहीं, पिकनिक मनाकर लौटा हूँ। ऊपर से साहब की डांट, नीचे से बाबुओं की चालाकी, और बीच में मैं…..एकदम “सरकारी सैंडविच”।
इन्हीं सब समस्याओं से त्रस्त होकर एक दिन मैंने तय किया कि अब बस! जिंदगी को “रीसेट” करना होगा। और रीसेट का सबसे सस्ता और सुलभ तरीका क्या है? डॉक्टर! सो मैं सीधे डॉक्टर साहब के क्लिनिक जा पहुँचा।
क्लिनिक में पहुंचते ही मैंने बिना नंबर के ही अंदर घुसने की कोशिश की, क्योंकि सरकारी कर्मचारी होने के नाते मुझे “लाइन में लगना” थोड़ा असंवैधानिक लगता है। अंदर पहुँचते ही कुर्सी पर धम्म से बैठा और शुरू हो गया, “डॉक्टर साहब, मुझे कोई ऐसी दवा दीजिए कि सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएं। ऑफिस में साहब जान खा रहे हैं, घर में पत्नी ताने दे रही है, बच्चे मुझे एटीएम समझते हैं और मोहल्ले वाले तो ऐसे देखते हैं जैसे मैं ही देश की अर्थव्यवस्था बिगाड़ने का जिम्मेदार हूँ।”
डॉक्टर साहब चुपचाप मेरी बातें सुनते रहे। बीच-बीच में “हूँ”, “अच्छा” और “फिर?” जैसे शब्दों का प्रयोग करते रहे, जिससे मुझे लगा कि वे मेरी पीड़ा को गंभीरता से ले रहे हैं। लेकिन सच कहूँ तो मुझे बोलने में इतना मजा आ रहा था कि अगर वे बीच में रोकते भी तो मैं नहीं रुकता।
मैंने अपनी पूरी रामकथा सुना डाली- कैसे ऑफिस में एक फाइल तीन-तीन महीने तक घूमती है, कैसे साहब हर मीटिंग में “काम में तेजी लाओ” का भाषण देते हैं, और कैसे घर में मेरी पत्नी हर महीने “तुम्हारी सैलरी इतनी कम क्यों है?” का ऑडिट करती है।
लगभग आधे घंटे तक लगातार बोलने के बाद जब मेरा गला सूख गया, तब डॉक्टर साहब ने पानी का गिलास मेरी ओर बढ़ाया और मुस्कुराते हुए बोले-“भाई, आप पुलिसकर्मियों का दर्द नहीं समझ सकते।”
मैं थोड़ा चौंका। सोचा-“अरे! मैं अपनी समस्या लेकर आया हूँ, और ये पुलिस की कहानी सुना रहे हैं?” लेकिन अब तक मैं इतना बोल चुका था कि जवाब में कुछ सुनना भी मेरी जिम्मेदारी बनती थी।
डॉक्टर साहब ने चश्मा ठीक किया और बोले….
“आप आठ घंटे की नौकरी से परेशान हैं, वे चौबीस घंटे की जिंदगी जीते हैं… जिसमें ‘ड्यूटी’ नाम का राक्षस हर समय सिर पर सवार रहता है।”
मैं चुप हो गया। अब डॉक्टर साहब पूरी गति में थे-
“आपको कभी-कभी साहब की डाँट सुननी पड़ती है। उन्हें हर समय सुननी पड़ती है….ऊपर से भी, नीचे से भी और बीच-बीच में जनता से भी। उनके लिए ‘ऑफ डे’ नाम की चीज़ सिर्फ सरकारी फाइलों में होती है। घर में बैठते ही फोन आ जाएगा- “तुरंत थाने पहुँचिए।”…….. “देखिए, पुलिस वालों की जिंदगी में ‘ऑफिस टाइम’ नाम की कोई चीज नहीं होती। 24 घंटे की ड्यूटी, और छुट्टी मिली तो चार दिन का आराम….वह भी अगर कोई नया बवाल न हो जाए तो। उन्हें खुद नहीं पता होता कि कब सोना है और कब जागना है। कुर्सी पर बैठते हैं तो वायरलेस बज उठता है- “तुरंत निकलो”। घर में खाना खा रहे हों तो फोन- “सर, घटना हो गई है”। अब बताइए, यह जिंदगी है या ‘रियलिटी शो’?”
“ऊपर से सीनियर का दबाव….चाहे आदेश व्यावहारिक हो या अव्यावहारिक, पालन करना ही है। नीचे अपराधी; जो हर समय नई स्कीम लेकर तैयार रहते हैं। और बीच में जनता….जिसकी घरेलू खिचखिच भी पुलिस ही सुलझाए। पति-पत्नी का झगड़ा हो, पड़ोसी का विवाद हो, या गाय का बछड़ा खो जाए -सब पुलिस के जिम्मे।”
मैंने हल्की-सी हामी भरी, पर डॉक्टर साहब रुके नहीं-
“सोचिए, एक पुलिसकर्मी कब सोता है? उसे खुद नहीं पता। खाना कब खाता है? यह भी तय नहीं। त्यौहार? वो क्या होता है? दिवाली में पटाखे नहीं, वायरलेस बजता है। होली में रंग नहीं, भीड़ नियंत्रण होता है। ईद में सेवइयाँ नहीं, सुरक्षा ड्यूटी होती है।”
अब मेरी शिकायतें धीरे-धीरे शर्माने लगी थीं।
डॉक्टर साहब आगे बोले – “और जनता… जनता तो उन्हें ‘ऑल इन वन’ समझती है। कहीं पति-पत्नी का झगड़ा हो गया -पुलिस बुलाओ। पड़ोसी की बकरी खेत में घुस गई -पुलिस बुलाओ। मोबाइल खो गया -पुलिस बुलाओ। शादी में डीजे तेज बज रहा -पुलिस बुलाओ। जैसे पुलिस नहीं, ‘होम सर्विस ऐप’ हो!”
मैं अनायास हँस पड़ा, लेकिन वह हँसी थोड़ी कड़वी थी।
“और मीडिया…” डॉक्टर साहब ने लंबी सांस ली,
“वो हर समय तैयार रहता है। अगर पुलिस ने कुछ नहीं किया तो भी खबर, और अगर कुछ कर दिया तो भी खबर। ‘पुलिस सो रही थी’ या ‘पुलिस ने ज्यादा कर दिया’….दोनों ही हेडलाइन बनती हैं।”
अब मुझे लगा कि मेरी परेशानी सच में छोटी है।
“ऊपर से अपराधी…” डॉक्टर साहब ने स्वर धीमा किया,
“जो कानून से नहीं, मौके से चलते हैं। और पुलिसकर्मी उनके पीछे अपनी जान जोखिम में डालकर भागता है। कई बार घर से निकलता है तो यह भी तय नहीं होता कि शाम को वापस आएगा या नहीं।”
मेरे चेहरे की मुस्कान अब पूरी तरह गायब थी।
“और सबसे बड़ी बात…” डॉक्टर साहब ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा,
“वह इंसान होते हुए भी ‘इंसान’ नहीं रह पाता। उसे हर समय वर्दी में रहना पड़ता है, भले ही वह घर में हो या बाजार में। उसकी पहचान, उसकी आज़ादी, उसकी थकान … सब वर्दी के अंदर कैद हो जाती है।”
कमरे में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।
मैंने धीरे से पूछा- “तो डॉक्टर साहब, उनकी दवा क्या है?”
डॉक्टर साहब हल्के से मुस्कुराए-
“दवा? उनकी दवा कोई मेडिकल स्टोर में नहीं मिलती। उनकी दवा है -सम्मान, सहयोग और थोड़ा-सा मानवीय व्यवहार।”
मैं कुर्सी से उठने लगा। मेरे चेहरे पर अब वैसी बेचैनी नहीं थी।
डॉक्टर साहब ने पीछे से आवाज दी…
“और हाँ, आपकी दवा भी यही है -थोड़ा नजरिया बदल लीजिए, जिंदगी खुद-ब-खुद हल्की लगने लगेगी।”
मैं बाहर निकला। सड़क पर एक पुलिसकर्मी खड़ा था…धूप में, पसीने से तर, ट्रैफिक संभालता हुआ।
पहली बार मैंने उसे ध्यान से देखा… और मन ही मन सोचा-
“सच में, हम सब अपनी-अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में उलझे हैं, लेकिन इनकी परीक्षा सबसे कठिन है… और परीक्षक भी सबसे कठोर।”

