बड़े भाग्य से यह मनुष्य शरीर मिलता है पर मनुष्य इस संसार में आकर भोग विलास में डूब जाता है और प्रभु को भूल जाता…
View More कि आरे भाई राम नाम सुखदाई…-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रAuthor: admin
मूरारी गिरवरधारी राखो लाज हमारी…..- ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
द्रौपदी के चीरहरण पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना:—-. मूरारी गिरवरधारी राखो लाज हमारी । हो मूरारी गिरवरधारी राखो……… बीच सभा में देखो दुष्ट दुशासन,…
View More मूरारी गिरवरधारी राखो लाज हमारी…..- ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रऐ हनुमत तोह से उरिन हम नाहीं……-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
लंका युद्ध समाप्त होने के पश्चात् प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी को हृदय से लगा कर कहा कि हे हनुमान जगत में तुम्हारे समान मेरा…
View More ऐ हनुमत तोह से उरिन हम नाहीं……-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रनाथ पार हम उतरबो जी चरनियाँ धोइ के….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
भगवान राम गंगा पार उतरना चाहते हैं पर केवट नाव नहीं ला रहा है, कहता है कि हे नाथ जब तक चरण नहीं धुलाईयेगा तब…
View More नाथ पार हम उतरबो जी चरनियाँ धोइ के….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रहे मैया शारदे अरज मोर सुन लो….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
प्रस्तुत है मेरी ये रचना सरस्वति वन्दना :——-. हे मैया शारदे अरज मोर सुन लो , भक्तन का करदो कल्यान । हे जननी भक्तन का…
View More हे मैया शारदे अरज मोर सुन लो….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रपरहित सरिस धरम नहिं भाई….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
बड़े भाग्य से यह मानव शरीर मिलता है । इस शरीर को पा कर सुन्दर कर्म करना चाहिये तभी इस पावन शरीर को पाने की…
View More परहित सरिस धरम नहिं भाई….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रतुम बिन हमरी कौन खबर ले….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
प्रस्तुत है शरणागत भजन के रूप में मेरी ये रचना :—. तुम बिन हमरी कौन खबर ले , माधव मदन मुरारी जी । तुम शरणागत…
View More तुम बिन हमरी कौन खबर ले….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रदशरथ के चारो ललनवाँ…..-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
राजा दशरथ के चारों पुत्र आँगन में खेल रहे हैं। प्रस्तुत है भोजपुरी में मेरी ये रचना जिसमें मैने उनकी शोभा का वर्णन किया है…
View More दशरथ के चारो ललनवाँ…..-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रदेखो सज गइ आज अवध नगरी….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
प्रभु श्रीराम वनवास समाप्त कर सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या लौट आए। गुरु बशिष्ठ जी, सभी माताएँ, भाई भरत जी और शत्रुघ्न…
View More देखो सज गइ आज अवध नगरी….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्ररे मन! अब कहीं न जा….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र
प्रस्तुत है मेरी ये रचना शरणागत भजन के रूप में :——. रे मन! अब कहीं न जा । राम चरण को छोड़ बावरे, कहीं शरण…
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