व्यंग्य : आया मौसम फिर ‘फरारी’ का

– पूर्णेन्दु पुष्पेश. 

गणतंत्र दिवस आते ही देश में एक अनोखा मौसम दस्तक देता है। न ठंड का, न गर्मी का…यह मौसम है विज्ञापन-फरारी का। मतलब दफ्तर से फ़रार हो जाने का! जैसे ही 26 जनवरी की आहट होती है, सरकारी कार्यालयों, थानों, निगमों, समितियों और संस्थानों में एक अजीब सी हलचल शुरू हो जाती है। बाहर पत्रकारों की आवाजाही बढ़ जाती है और अंदर अधिकारियों की उपस्थिति… धीरे-धीरे लुप्त होने लगती है।

इस मौसम की सबसे खास पहचान यह है कि जितने ज़्यादा पत्रकार बाहर मिलेंगे, उतने ही कम अधिकारी अंदर मिलेंगे। दफ्तर से ओहदेदार फ़रार! थानों से थानेदार फ़रार! फोन बंद! या फिर फोन का ‘नॉट रीचेबल’ हो जाना। कोई मीटिंग में है, कोई “फील्ड विज़िट” पर, कोई “अति आवश्यक कार्यवश बाहर” और कई तो सीधे “आज उपलब्ध नहीं” की श्रेणी में डाल दिए जाते हैं। साहब का बाबू मिलेगा भी तो बोलेगा – सर छुट्टी पर हैं या ट्रेनिंग पर गए हैं। ‘विज्ञापन’ के बारे में कुछ बोल कर नहीं गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये फरारी 10-15 दिन पहले ही शुरू हो जाती है, मानो कोई गोपनीय अलर्ट जारी हो गया हो -“विज्ञापन माँगने वाले आने वाले हैं, सावधान रहें।” स्थिति ऐसी बदत्तर हो गई है कि थानेदार तो खैर, SDPO और SP साहेब तक 500-500 रुपये का ‘बख्शीस’ जारी करने में तनिक संकोच नहीं करते अब। वैसे इस कार्य में सरकारभी अपने बन्दों का भरपूर सहयोग करती है। सरकार को भी यही मौसम मिलता है भारी तबादलों का। तो नए ‘साहब’ से कहीं भेंट हो भी जाये तो तपाक से कहते हैं -“अभी अभी तो आया हूँ; अगली बार पक्का!”

अब पत्रकार भी कौन सा कम अभ्यास किए हुए हैं। गणतंत्र दिवस आते ही जायज़-नाजायज़, पंजीकृत-अनिबंधित, असली-नकली, सब एक ही कतार में खड़े दिखते हैं। किसी के हाथ में फाइल, किसी के मोबाइल में पीडीएफ, तो किसी के चेहरे पर सीधा-सादा मासूम भाव -“सर, बस छोटा सा विज्ञापन…”। और उधर अधिकारी सोचते हैं -“छोटा सा विज्ञापन आज दिया, तो कल पूरा बजट मांग लेंगे।”

यहीं से शुरू होती है फरारी की महान परंपरा। अधिकारी मान लेते हैं कि आंख बंद कर लेने से खतरा टल जाएगा। जैसे बचपन में हम आंख बंद करके सोचते थे कि सामने वाला हमें देख नहीं पा रहा, वैसे ही कार्यालय बंद कर देने से पत्रकार भी अदृश्य हो जाएंगे….ऐसी एक मासूम-सी लेकिन पुरानी धारणा।

लेकिन जनाब, यह 2026 है। पत्रकार अब सिर्फ दरवाज़े पर दस्तक नहीं देते, वे व्हाट्सएप करते हैं, मोबाइल कॉल बंद है तो व्हाट्सएप कॉल करते हैं, मैसेज छोड़ते हैं और कभी-कभी तो मुस्कुराते हुए यह भी कह देते हैं -“सर, रजिस्टर्ड मीडिया से हैं।” और यही वो पल होता है, जब फरारी थोड़ी असहज होने लगती है।

असल समस्या विज्ञापन देने में नहीं, पहचानने में है। जायज़-नाजायज़ 100-150 पत्रकारों के विज्ञापनपत्र आ जाते हैं। अधिकारी अक्सर सोच में पड़ जाते हैं -किसे दें, किसे न दें। डर ये नहीं कि विज्ञापन क्यों दिया, डर ये होता है कि “गलत को क्यों दे दिया।” और इसी डर से सही को भी नहीं दिया जाता। नतीजा -सबको मना कर देना, या सबसे बचते फिरना।

जबकि समाधान बड़ा सीधा है। विज्ञापन दीजिए -लेकिन पहचान कर दीजिए। पंजीकृत मीडिया, मान्यता प्राप्त पोर्टल, असली कार्यालय, जिम्मेदार पत्रकार -इनको विज्ञापन देना कोई अपराध नहीं है। उल्टा, यह व्यवस्था का सम्मान है। गणतंत्र दिवस का विज्ञापन कोई निजी एहसान नहीं, यह जनता के पैसे से जनता तक संदेश पहुँचाने का माध्यम है।

यह भी समझना ज़रूरी है कि विज्ञापन मांगने वाला हर पत्रकार ब्लैकमेलर नहीं होता। और हर अधिकारी विज्ञापन देने से डर कर फरार हो जाए, यह भी कोई प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है। फरारी से न तो समस्या खत्म होती है, न ही पत्रकारिता। बस अविश्वास बढ़ता है और व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।

विडंबना देखिए…..जो अधिकारी साल भर योजनाओं के प्रचार की बात करते हैं, वही गणतंत्र दिवस पर प्रचार से भागते नजर आते हैं। जैसे विज्ञापन कोई बीमारी हो और पत्रकार उसका वायरस। जबकि सच यह है कि संतुलित विज्ञापन व्यवस्था ही स्वस्थ मीडिया और स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है

तो साहब, इस गणतंत्र दिवस पर एक छोटा सा संकल्प लीजिए। कार्यालय से फरार मत होइए। आंख बंद करके बचने का प्रयोग छोड़ दीजिए। सामने आइए, फाइल खोलिए, पहचान कीजिए और फिर विज्ञापन दीजिए —-लेकिन पंजीकृत, जिम्मेदार और वास्तविक मीडिया को।

यकीन मानिए, इससे न बजट डूबेगा, न कुर्सी जाएगी। उल्टा, आपकी कार्यप्रणाली की चर्चा जरूर होगी; और वो भी सकारात्मक विज्ञापन के साथ।
क्योंकि गणतंत्र में फरारी नहीं, जवाबदेही ही असली देशभक्ति है।

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