– पूर्णेन्दु पुष्पेश
भगवान करे मेरे ख़ानदान में पप्पू पैदा न हो! यह कोई व्यक्तिगत दुर्भावना नहीं है, न ही किसी नवजात के भविष्य को कोसने का इरादा। यह एक सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक आत्मरक्षा की प्रार्थना है। क्योंकि पप्पू कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि एक संपूर्ण मानसिकता है। पप्पू वह होता है जो जन्म लेते ही यह मान लेता है कि दुनिया ने उसके लिए रेड कारपेट बिछा रखी है, बस उसे चलना है, भले ही दिशा उल्टी क्यों न हो।
पप्पू का जन्म आमतौर पर उस खानदान में होता है जहाँ संघर्ष को फोटो फ्रेम में टाँग दिया गया हो और मेहनत को किताबों में बंद कर दिया गया हो। पप्पू को विरासत में कुर्सी मिलती है, सवाल नहीं। उसे मंच मिलता है, लेकिन प्रशिक्षण नहीं। वह बचपन से सुनता आया है -“तू खास है रे!”…..और इसी वाक्य ने उसे साधारण बनने की मेहनत से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया।
पप्पू पढ़ा-लिखा भी होता है। शायद सचमुच का बहुत पढ़ा-लिखा। इतना पढ़ा-लिखा कि ‘डिग्रियाँ’ देखकर अलमारी झुक जाए। कभी वह विदेशी विश्वविद्यालयों में ज्ञान बटोरता है, बाँटता है। कभी सेमिनारों में लोकतंत्र बचाता फिरता है। लेकिन जब बात ज़मीनी सच्चाई की आती है तो पप्पू का ज्ञान ठीक वैसा ही होता है जैसे बिना सिम का स्मार्टफोन। महँगा, चमकदार और काम का नहीं। उसे पता होता है कि दुनिया में समस्या है, पर यह नहीं पता होता कि समस्या क्या है और कहाँ है?!
पप्पू की सबसे बड़ी ताकत उसका आत्मविश्वास है। यह वही आत्मविश्वास है जो बिना तैयारी के परीक्षा देने वाले छात्र के चेहरे पर दिखता है -“देखा जाएगा” टाइप। पप्पू किसी भी विषय पर ऐसे बोलता है जैसे उसी ने उक्त विषय को जन्म दिया हो। नवाचार करता है। अर्थव्यवस्था पर बोले तो लगता है अर्थशास्त्र ने अभी-अभी इस्तीफा दे दिया है। इतिहास की बात करे तो इतिहास शर्म से खुद को अपडेट मोड में डाल लेता है। विज्ञान पर बोले तो न्यूटन और आइंस्टीन आत्महत्या की फाइल खोल लेते हैं।
पप्पू के पास हर समस्या का समाधान होता है, लेकिन समाधान से पहले समस्या समझने की जहमत वह नहीं उठाता। उसे लगता है कि भावना ही सबसे बड़ा तथ्य है। आँकड़े बोरिंग हैं, ज़मीनी रिपोर्ट पुरानी है, विशेषज्ञ संदिग्ध हैं। बस पप्पू की भावना सच्ची है। वह कैमरे के सामने खड़ा होकर देश की जटिल समस्याओं को ऐसे सरल बना देता है कि समस्या ही पहचान में न आए।
पप्पू की एक खास बीमारी होती है। माइक फोबिया नहीं, बल्कि माइक मोह। जैसे ही माइक दिखा, पप्पू का ज्ञान स्वतः सक्रिय हो जाता है। चाहे सवाल पूछा गया हो या नहीं, जवाब तैयार रहता है। कई बार तो सवाल से पहले ही जवाब आ जाता है, और जवाब सुनकर सवाल खुद ही गायब हो जाता है। पप्पू मानता है कि बोलना ही नेतृत्व है, चुप रहकर सीखना कमजोरी।
राजनीति में पप्पू कोई अपवाद नहीं, बल्कि सुविधा है। वह उस सिस्टम का उत्पाद है जहाँ नाम योग्यता से भारी होता है। जहाँ “कौन हो तुम?” से ज्यादा अहम “किसके हो तुम?” होता है। पप्पू हर चुनाव के बाद कहता है -“हम सीख रहे हैं।” लेकिन समस्या यह है कि पप्पू की सीखने की प्रक्रिया उतनी ही लंबी है जितनी उसकी यात्राएँ, और उतनी ही निष्फल जितनी उसकी राजनीति, जितनी उसकी रणनीति।
पप्पू जनता से जुड़ने की कोशिश में ऐसे उदाहरण देता है कि जनता सोच में पड़ जाती है -“हमें जोड़ रहा है या खुद उलझ गया है?” कभी वह सब्ज़ी से विज्ञान समझाता है, कभी फल से अर्थव्यवस्था, और कभी भावनाओं से नीति। पप्पू का संवाद भावनात्मक होता है, लेकिन प्रभावहीन। वह जनता को रुला सकता है, हँसा सकता है, लेकिन भरोसा नहीं जगा पाता।
आलोचना पप्पू को बहुत प्रिय है। लेकिन आत्मसुधार के लिए नहीं, बल्कि सहानुभूति बटोरने के लिए। पप्पू के लिए आलोचना का मतलब होता है -“मैं सही रास्ते पर हूँ, तभी तो लोग डर रहे हैं।” हर हार उसके लिए नैतिक जीत होती है, हर पराजय वैचारिक सफलता। सवाल पूछने वाला दुश्मन है, जवाब देने वाला सिस्टम।
पप्पू की टीम हमेशा वही रहती है, बस चेहरे बदलते रहते हैं। सलाहकार आते हैं, जाते हैं, लेकिन पप्पू वही रहता है। बिलकुल अडिग, अचल, आत्मविश्वास से भरा हुआ। उसे लगता है कि समस्या उसके विचारों में नहीं, जनता की समझ में है। अगर जनता उसे नहीं समझ रही, तो गलती जनता की है; पप्पू की नहीं।
सबसे खतरनाक बात यह है कि पप्पू अकेला नहीं रहता। उसके आसपास के समझदार लोग भी धीरे-धीरे पप्पू बनने लगते हैं। क्योंकि पप्पू के साथ रहने के लिए या तो आपको ‘पप्पू’ बनना पड़ता है या चुप रहना पड़ता है। और राजनीति में चुप रहना भी एक तरह की पप्पूगिरी ही है। ऐसा व्यक्ति अपने दल को रसातल में ले जाता है और बीजेपी जैसी पार्टियों को शिखर पर पहुंचा सकता है। संभवतः ऐसे पप्पू और दलों में भी मौजूद हों और जो पढ़े लिखे होते हुए भी पप्पूगिरि को अपना मूल धंधा बनाये हुए हों। ईश्वर की कृति ‘मनुष्यजन्म’ को गलत सिद्ध करने में लगे हुए हों।
इसीलिए भगवान से प्रार्थना है कि मेरे ख़ानदान में पप्पू पैदा न हो। अगर हो भी जाए, तो उसे विरासत नहीं, ज़िम्मेदारी मिले। उसे कुर्सी नहीं, कक्षा मिले। उसे माइक नहीं, मेहनत मिले। उसे तालियाँ नहीं, तर्क मिलें। क्योंकि पप्पू कोई मज़ाक नहीं, एक चेतावनी है. ….कि अगर अवसर योग्यता से पहले मिल जाए, तो देश को भी भुगतना पड़ता है।
यह व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, उस प्रवृत्ति पर है जो नाम के सहारे चलती है, मेहनत से डरती है और आलोचना से भागती है। पप्पू हर उस जगह मौजूद है जहाँ सवाल पूछने से पहले ताली बजा दी जाती है। और इसलिए पूरे सम्मान के साथ, पूरी संवैधानिक भावना के साथ, और पूरी व्यंग्यात्मक ईमानदारी के साथ – “भगवान करे, मेरे ख़ानदान में पप्पू पैदा न हो।”

