वर्दी है, कुर्सी नहीं: झारखंड की प्रशासनिक उलझन

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश

– रिक्तियां भी हैं, अफसर भी -फिर देरी क्यों?

झारखंड में इन दिनों एक अजीब सी स्थिति बनी हुई है। अफसर हैं, वर्दी है, वेतन है, काम भी है….. लेकिन पद नहीं है। सुनने में यह थोड़ा अटपटा लगता है, पर हकीकत यही है। राज्य में सौ से अधिक डीएसपी, एसडीएम और वन सेवा के अधिकारी ऐसे हैं जो महीनों से अपनी औपचारिक पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं। वे रोज दफ्तर जाते हैं, जिम्मेदारियां निभाते हैं, लेकिन कागजों में उनकी स्थिति साफ नहीं है। सवाल सिर्फ उनकी व्यक्तिगत परेशानी का नहीं है, यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

सबसे पहले बात पुलिस विभाग की। एक तरफ कहा जा रहा है कि राज्य में अधिकारियों की कमी है। नई नियुक्तियों के लिए विज्ञापन निकल रहे हैं। दूसरी तरफ, प्रशिक्षण पूरा कर चुके दर्जनों डीएसपी महीनों से बिना स्थायी तैनाती के बैठे हैं। इनमें नए भर्ती अधिकारी भी हैं और वे भी, जिन्हें वर्षों की सेवा के बाद पदोन्नति मिली है। सोचिए, कोई अधिकारी तीन दशक की नौकरी के बाद डीएसपी बनता है और फिर उसे महीनों तक इंतजार करना पड़ता है कि उसे आखिर जिम्मेदारी कब दी जाएगी। यह स्थिति स्वाभाविक रूप से निराशा पैदा करती है।

मामला सिर्फ पुलिस तक सीमित नहीं है। अनुमंडल पदाधिकारी, जिन्हें प्रखंड विकास पदाधिकारी से पदोन्नत किया गया, वे भी लंबे समय से आदेश की प्रतीक्षा में हैं। वन सेवा के युवा अधिकारी, जो देश की कठिनतम परीक्षाओं में से एक पास कर यहां पहुंचे हैं, वे भी फाइलें संभालने और प्रस्तुति तैयार करने तक सीमित हैं, जबकि फील्ड में रिक्तियां मौजूद हैं। यह तस्वीर किसी एक विभाग की चूक नहीं लगती, बल्कि समन्वय की कमी की ओर इशारा करती है।

यहां सबसे गंभीर पहलू जवाबदेही का है। कोई भी प्रशासनिक पद सिर्फ कुर्सी नहीं होता, वह जिम्मेदारी का दायरा तय करता है। जब किसी अधिकारी को औपचारिक रूप से पदस्थापित नहीं किया जाता, तो वह निर्णय लेने की स्थिति में भी नहीं होता। वह काम तो करता है, लेकिन अधिकार और जवाबदेही के बीच संतुलन नहीं बन पाता। अगर कल कोई विवाद हो जाए, कोई निर्णय गलत साबित हो जाए, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? यह अस्पष्टता न तो शासन के लिए अच्छी है और न ही अधिकारियों के मनोबल के लिए।

सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि प्रक्रिया जारी है। यह भी कहा गया कि कुछ अधिकारियों को प्रशिक्षण और चुनावी कार्यों में लगाया गया है। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है। प्रशासन में कई बार फाइलें समय लेती हैं, कैडर प्रबंधन जटिल होता है, और राजनीतिक-प्रशासनिक प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं। लेकिन जब देरी महीनों से बढ़कर साल पार करने लगे, तो उसे सामान्य प्रक्रिया कहकर टालना कठिन हो जाता है।

एक और दिलचस्प पहलू है….नई भर्तियों का विज्ञापन। जब पहले से उपलब्ध अधिकारियों को जिम्मेदारी नहीं मिली है, तब नए पदों के लिए आवेदन क्यों मांगे जा रहे हैं? संभव है कि यह दीर्घकालिक योजना का हिस्सा हो। संभव है कि रिक्तियों का स्वरूप अलग हो। लेकिन आम नजर से देखें तो यह विरोधाभास जैसा लगता है। इससे यह संदेश जाता है कि व्यवस्था में तालमेल की कमी है।

विधानसभा में भी यह मुद्दा उठा है। विपक्ष ने सवाल किए हैं। सत्ता पक्ष ने आश्वासन दिया है। यह लोकतंत्र की स्वस्थ प्रक्रिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आश्वासन से आगे बढ़कर कोई ठोस समयसीमा तय की जाएगी? प्रशासनिक सुधार सिर्फ बयान से नहीं, निर्णय से दिखते हैं।

वित्तीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। नियम कहते हैं कि बिना औपचारिक पदस्थापन के लंबे समय तक वेतन देना ठीक नहीं। हालांकि अधिकारी सेवा में हैं, इसलिए वेतन मिलना उनका अधिकार है। लेकिन जब कार्य और पद स्पष्ट न हो, तो लेखा-जोखा और जवाबदेही की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं। यह भविष्य में ऑडिट और कानूनी सवालों का कारण बन सकता है। बेहतर होगा कि इस स्थिति को जल्द स्पष्ट किया जाए।

इस पूरे प्रकरण को सिर्फ आलोचना के चश्मे से देखना भी उचित नहीं होगा। झारखंड एक अपेक्षाकृत युवा राज्य है। यहां प्रशासनिक ढांचे को स्थिर और प्रभावी बनाने की प्रक्रिया अभी भी जारी है। कई बार कैडर आवंटन, वरिष्ठता सूची, पदों की स्वीकृति और राजनीतिक परिस्थितियां मिलकर ऐसी जटिलताएं पैदा कर देती हैं। लेकिन यही वह समय होता है जब संस्थागत सुधार की जरूरत महसूस होती है।

सबसे पहला कदम पारदर्शिता का हो सकता है। अगर पोस्टिंग में देरी के ठोस कारण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। एक स्पष्ट टाइमलाइन दी जाए कि कब तक किस बैच को तैनाती मिलेगी। इससे अफसरों का मनोबल भी बना रहेगा और जनता का भरोसा भी।

दूसरा, विभागों के बीच समन्वय मजबूत करना जरूरी है। अगर गृह विभाग, कार्मिक विभाग और वित्त विभाग के बीच फाइलें घूम रही हैं, तो एक संयुक्त बैठक कर निर्णय लिया जा सकता है। मुख्यमंत्री के अधीन आने वाले विभागों में समन्वय की जिम्मेदारी और भी अधिक है।

तीसरा, कैडर प्रबंधन की दीर्घकालिक नीति पर पुनर्विचार की जरूरत है। कितने पद स्वीकृत हैं, कितने भरे हुए हैं, कितने खाली हैं? इसका अद्यतन डेटा सार्वजनिक होना चाहिए। इससे भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।

और सबसे महत्वपूर्ण, अधिकारियों के मनोबल का सवाल। एक युवा अधिकारी जब सेवा में आता है, तो उसके भीतर ऊर्जा और आदर्श होते हैं। अगर शुरुआती साल ही अनिश्चितता में बीत जाएं, तो उसका असर पूरे करियर पर पड़ सकता है। वही अधिकारी आगे चलकर जिलों की कानून-व्यवस्था संभालेंगे, विकास योजनाओं की निगरानी करेंगे, जंगल और जमीन की रक्षा करेंगे। उनका आत्मविश्वास मजबूत होना चाहिए, न कि कमजोर।

झारखंड जैसे राज्य में, जहां कानून-व्यवस्था, विकास और पर्यावरण…..तीनों ही मोर्चों पर चुनौतियां हैं, वहां प्रशिक्षित और ऊर्जावान अधिकारियों का सही उपयोग होना बेहद जरूरी है। उन्हें प्रतीक्षा कक्ष में बैठाकर रखना न राज्य के हित में है और न प्रशासन के।

यह समय है कि सरकार इस मुद्दे को प्राथमिकता दे। विपक्ष के सवालों को राजनीतिक चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि सुधार के अवसर के रूप में देखा जाए। अगर अगले कुछ महीनों में सभी लंबित पोस्टिंग स्पष्ट कर दी जाती हैं, तो यह एक सकारात्मक संदेश होगा कि सरकार प्रशासनिक दक्षता को लेकर गंभीर है।

आखिरकार, बात किसी एक बैच या कुछ अधिकारियों की नहीं है। बात उस व्यवस्था की है, जो नागरिकों को सेवा देने के लिए बनाई गई है। जब व्यवस्था के भीतर ही स्पष्टता नहीं होगी, तो बाहर तक उसका असर जाएगा। इसलिए जरूरी है कि “कागज पर अस्तित्व” की यह उलझन जल्द खत्म हो और हर अधिकारी को उसका स्पष्ट दायित्व, अधिकार और जवाबदेही मिले।

झारखंड को मजबूत प्रशासन चाहिए। और मजबूत प्रशासन की पहली शर्त है -स्पष्ट पद, स्पष्ट जिम्मेदारी और स्पष्ट निर्णय। अब देखना है कि यह स्पष्टता कब तक आती है।