- पूर्णेन्दु पुष्पेश
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि जो हम मान रहे हैं, वही सही है। यह एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है। “We believe on what we want to believe” – यह वाक्य सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि हमारे सोचने के तरीके का आईना है। हम अपनी पसंद, अपने अनुभव और अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर चीज़ों को स्वीकार करते हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब हम यह समझ लेते हैं कि हमारा विश्वास ही अंतिम सत्य है।
आज के दौर में जानकारी की कोई कमी नहीं है। सोशल मीडिया, न्यूज पोर्टल, व्हाट्सएप फॉरवर्ड…..हर जगह सूचनाओं की बाढ़ है। ऐसे में हम अपने-अपने “स्रोत” चुन लेते हैं। कोई एक खास न्यूज चैनल देखता है, कोई एक खास यूट्यूब चैनल, तो कोई किसी खास व्यक्ति के विचारों को ही अंतिम मान लेता है। धीरे-धीरे यह स्रोत हमारे लिए “सत्य का पर्याय” बन जाते हैं। लेकिन क्या हर स्रोत सही होता है? इसका जवाब सीधा है -नहीं।
दरअसल, हम जिस स्रोत पर भरोसा करते हैं, वह भी इंसानों द्वारा संचालित होता है, और इंसान पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होता। हर व्यक्ति, हर संस्था की अपनी सोच, अपना नजरिया और कभी-कभी अपना स्वार्थ भी होता है। यही कारण है कि एक ही घटना को अलग-अलग स्रोत अलग-अलग तरीके से पेश करते हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी राजनीतिक घटना को एक चैनल सकारात्मक रूप में दिखाएगा, तो दूसरा उसी को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करेगा। दोनों के पास अपने-अपने “तथ्य” होंगे, लेकिन सच इन दोनों के बीच कहीं छिपा होता है।
यहां एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक पहलू भी काम करता है, जिसे “कन्फर्मेशन बायस” कहा जाता है। इसका मतलब है कि हम वही जानकारी ढूंढते और स्वीकार करते हैं जो हमारे पहले से बने हुए विचारों से मेल खाती है। अगर कोई खबर हमारे विश्वास के खिलाफ जाती है, तो हम उसे या तो नजरअंदाज कर देते हैं या फिर उस पर शक करने लगते हैं। इस तरह हम अपने ही बनाए हुए दायरे में कैद हो जाते हैं, जहां हमें वही दिखता है जो हम देखना चाहते हैं।
सोशल मीडिया ने इस समस्या को और गहरा कर दिया है। एल्गोरिद्म हमें वही कंटेंट दिखाते हैं, जिसे हम पसंद करते हैं या जिस पर हम ज्यादा प्रतिक्रिया देते हैं। धीरे-धीरे हमारा पूरा डिजिटल संसार एक ही तरह की सोच से भर जाता है। हमें लगता है कि पूरी दुनिया हमारी तरह सोच रही है, जबकि असलियत इससे काफी अलग होती है। इस स्थिति में हमारे “स्रोत” और भी सीमित और पक्षपाती हो जाते हैं।
कई बार देखा गया है कि अफवाहें और गलत जानकारी बहुत तेजी से फैलती हैं। लोग बिना जांचे-परखे किसी भी खबर को आगे बढ़ा देते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह उनके विश्वास से मेल खाती है। बाद में जब सच्चाई सामने आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इससे न केवल समाज में भ्रम फैलता है, बल्कि कई बार इसका गंभीर परिणाम भी सामने आता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर स्रोत गलत है या किसी पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि इसका मतलब यह है कि हमें अपने भरोसे को “अंधा” नहीं बनने देना चाहिए। किसी एक स्रोत पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग स्रोतों से जानकारी लेना, तथ्यों की जांच करना और अपनी समझ से निष्कर्ष निकालना जरूरी है। सच तक पहुंचने का यही सबसे सही तरीका है।
हमें यह भी समझना होगा कि “विश्वास” और “सत्य” दो अलग-अलग चीजें हैं। विश्वास व्यक्तिगत होता है, जबकि सत्य वस्तुनिष्ठ होता है। किसी चीज़ पर विश्वास करने से वह सच नहीं बन जाती। सच को परखने के लिए प्रमाण, तर्क और संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत होती है।
अंत में बात इतनी सी है कि हमारे स्रोत हमारे लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वे अंतिम नहीं हैं। फिर कहूंगा ; “We believe on what we want to believe. we believe in our sources. it doesn’t mean that our sources are right.”! हर जानकारी को थोड़ी शंका और जांच के साथ देखना ही समझदारी है। क्योंकि सच हमेशा सामने नहीं होता, उसे ढूंढना पड़ता है; और यह काम तभी संभव है, जब हम अपने विश्वास के दायरे से बाहर निकलने की कोशिश करें।

