क्यों अमेरिका भारत से भयभीत है?

– पूर्णेन्दु ‘पुष्पेश ‘

विश्व राजनीति के इतिहास में अमेरिका लंबे समय तक एकमात्र शक्ति केंद्र माना जाता रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से लेकर 21वीं सदी की शुरुआत तक यदि कोई देश वैश्विक नीतियों, व्यापार, सैन्य गठबंधनों या तकनीकी दिशा तय करता था तो वह अमेरिका ही था। उसकी मुद्रा डॉलर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का केंद्र थी, उसकी तकनीक अन्य देशों के लिए मानक, और उसकी सेना भय का पर्याय। किंतु अब हालात बदल रहे हैं। आज अमेरिका की चिंता का नाम है भारत।

यह भय केवल हथियारों या सेना की ताक़त से नहीं उपजा है। यह भय इसलिए है क्योंकि भारत ने वैश्विक व्यवस्था के पुराने नियमों को तोड़कर अपनी ही राह बनानी शुरू कर दी है। और यही स्वतंत्रता, यही आत्मविश्वास अमेरिका को असहज करता है।

कभी अमेरिका का स्वर ही आदेश माना जाता था। अगर उसने किसी देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए तो उनकी अर्थव्यवस्था चरमरा जाती थी। यदि उसने अपनी नीति थोप दी तो अधिकांश देश दबाव में झुक जाते थे। लेकिन भारत इस परंपरा से अलग खड़ा हुआ। उसने धीरे-धीरे गरीबी, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच भी विकास की मजबूत नींव रखी।

जब बाकी दुनिया भारत की अव्यवस्था पर हंस रही थी, तब भारत चुपचाप वैज्ञानिक तैयार कर रहा था, तकनीक विकसित कर रहा था, उद्योग खड़े कर रहा था और शिक्षा का आधार मजबूत कर रहा था। आज यही मेहनत अमेरिका को सोचने पर मजबूर कर रही है—कि यह देश आखिर कब और कैसे इतना सशक्त हो गया कि इसे रोका ही नहीं जा सकता।

आज से दो दशक पहले तक यदि किसी देश को अंतरिक्ष अभियान, सुपरकंप्यूटर या उच्चस्तरीय मिसाइल तकनीक चाहिए होती तो अमेरिका या यूरोप ही विकल्प थे। लेकिन आज भारत न केवल यह सब बना रहा है बल्कि कम लागत और अधिक दक्षता के साथ कर रहा है।

चंद्रयान-3 की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि भारत केवल पीछे-पीछे चलने वाला देश नहीं है, बल्कि आगे बढ़कर नए मापदंड तय करने वाला राष्ट्र है। 5जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल पेमेंट और चिप निर्माण जैसे क्षेत्रों में भारत की आत्मनिर्भरता अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

भारत आज दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और आने वाले समय में तीसरे स्थान पर पहुंचने की राह पर है। पर यह केवल GDP का आंकड़ा नहीं है—यह 1.4 अरब लोगों की सामूहिक क्षमता का प्रतिबिंब है।

अमेरिकी कंपनियाँ दशकों से अन्य देशों को अपने बाज़ार के रूप में देखती आई हैं। लेकिन भारत ने साफ़ कहा—हमारा बाज़ार चाहिए तो हमारी शर्तों पर आइए। यह आत्मसम्मान न केवल अमेरिका की आदत के खिलाफ है बल्कि उसकी आर्थिक पकड़ को भी कमजोर करता है।

सैन्य बजट भले ही अमेरिका का सबसे बड़ा हो, परन्तु शक्ति का निर्धारण केवल पैसों से नहीं होता। भारत ने अपने दम पर मिसाइलें, पनडुब्बियाँ और उपग्रह आधारित हथियार प्रणाली विकसित की हैं।

बालाकोट और गलवान जैसी घटनाओं ने दिखा दिया कि भारत केवल ‘सॉफ्ट पावर’ ही नहीं है बल्कि आवश्यक होने पर निर्णायक कार्रवाई भी कर सकता है। यही बात अमेरिका को विचलित करती है, क्योंकि भारत अब दबाव में झुकने वाला राष्ट्र नहीं रहा।

अमेरिका की नीति हमेशा से रही है—एक देश को मित्र बनाना और दूसरे को शत्रु, ताकि उसका नियंत्रण बना रहे। लेकिन भारत इस खेल को बदल रहा है। रूस से हथियार और तेल खरीदता है, भले ही अमेरिका नाराज़ हो। खाड़ी देशों के साथ साझेदारी करता है, अफ्रीका से गहरे संबंध बनाता है। जापान, आसियान और यूरोप से भी मजबूत रिश्ते रखता है।

सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका को भी चीन का संतुलन बनाने के लिए भारत की ज़रूरत है। इस पारस्परिक निर्भरता ने शक्ति समीकरण पलट दिया है। यही अमेरिका की असली चिंता है।

संस्कृति भी शक्ति है। योग, आयुर्वेद, भारतीय भोजन, बॉलीवुड और अध्यात्म—ये सब दुनिया में भारत की पहचान बन चुके हैं। जहाँ पहले केवल हॉलीवुड और अमेरिकी संस्कृति वैश्विक कथा कहती थी, वहीं अब भारत की आवाज़ भी सुनी जाती है। यह सांस्कृतिक शक्ति धीरे-धीरे दुनिया की मानसिकता बदल रही है।

अमेरिका की शक्ति नियंत्रण से उपजी थी। भारत की शक्ति सहनशीलता से उपजी है—सदियों के आक्रमणों, दासता और संघर्ष के बावजूद जीवित रहना और आगे बढ़ना। यह वह ताक़त है जिसे कोई भी महाशक्ति डर से नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।

भारत की यही पहचान अमेरिका को भयभीत करती है। क्योंकि भारत किसी और की छतरी के नीचे नहीं, बल्कि अपने मार्ग पर चलकर उभर रहा है।

अमेरिका जानता है कि आने वाले समय में डॉलर का प्रभुत्व कमजोर होगा, सिलिकॉन वैली अकेला तकनीकी केंद्र नहीं रहेगा, हॉलीवुड का जादू भी साझा होगा और वॉशिंगटन अब अकेला शक्ति केंद्र नहीं रहेगा।

भय हमेशा विनाश से नहीं आता, कभी-कभी प्रतिस्थापन से आता है। अमेरिका को डर है कि वह शीर्ष स्थान से हट जाएगा और उसकी जगह लेने वाला कोई और नहीं बल्कि भारत होगा।

चीन के पास पैसा है लेकिन भरोसा नहीं, यूरोप के पास इतिहास है लेकिन जनसंख्या नहीं, रूस के पास हथियार हैं लेकिन प्रभाव नहीं। भारत के पास ये सब है—जनसंख्या, विकास, तकनीक, संस्कृति, लोकतंत्र और सहनशीलता।

अमेरिका भारत को मित्र और सहयोगी कहता है, लेकिन भीतर से वह जानता है कि शक्ति का समीकरण बदल रहा है। आने वाले कल में उसे भारत की ज़रूरत होगी—शायद उससे कहीं अधिक जितनी भारत को उसकी।

भारत का उदय किसी नीति का परिणाम भर नहीं है, यह उसके लोगों की ऊर्जा, इतिहास और नियति का संगम है। हर दिन करोड़ों भारतीय जिस जज़्बे के साथ मेहनत करते हैं, वही इस यात्रा को अजेय बना देता है।

अमेरिका ने जर्मनी, जापान और चीन को उभरते देखा है। परंतु भारत का उदय अलग है—यह स्वतंत्र है, आत्मनिर्भर है और अपने ही नियमों पर आधारित है।

और यही कारण है कि अमेरिका भारत से भयभीत है।

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