लंका युद्ध समाप्त होने के पश्चात् प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी को हृदय से लगा कर कहा कि हे हनुमान जगत में तुम्हारे समान मेरा कोई उपकारी नहीं है। जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो इस उपकार के बदले मैं तुम्हे दूँ। मैं तो तुम्हारे सामने होने लायक भी नहीं हूँ। मैने पूरी तरह विचार कर देख लिया है कि मैं तुम से कभी उरिण नहीं हो पाऊँगा। हे भैया अगर तू नहीं होते तो मुझे इस संसार में कौन लाता (प्रसिद्धि दिलाता)। इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना :—–.
ऐ हनुमत तोह से उरिन हम नाहीं ।
सौ योजन मरजाद सिन्धु की,
लाँघि गयो छन माँहीं ।
लंका जारि सिया सुधि लायो,
मद न भयो मन माँहीं ।
ऐ हनुमत तोह से उरिन…….
शक्तीबाण लगे लक्ष्मण को,
लाइ सँजीवन जिलाहीं ।
नागपाश जब निशिचर डाला,
गरुड़ बुलाइ छुड़ाहीं ।
ऐ हनुमत तोह से उरिन…….
प्रति उपकार में देहउँ तोहे,
वस्तु नहीं जग माँहीं ।
तु नहिं होते जो भैया,
मोहे कौन लातो जग माँहीं ।
ऐ हनुमत तोह से उरिन……
रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

