तू निर्मोही कहाँ छुपे हो….-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

तू निर्मोही कहाँ छुपे हो ?–

प्रेम के रस में पगे ये नैना,
प्रभु दर्शन को तरस रहे हैं।
तू निर्मोही कहाँ छुपे हो ?
नैना मेरे बरस रहे हैं।
मैं ब्रह्मेश्वर चातक बन कर,
तुमको प्रभू पुकार रहे हैं।
अब तो दर्शन देदो रघुबर,
पलक बिछाए राह खड़े हैं।

रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र