एक भक्त की भावना। भक्त कहता है कि हे प्रभु! मैं तो आपका सेवक हूँ, मुझे कभी भूलियेगा नहीं। आपके सिवा मेरा कोई सहारा नहीं है। मैं तो जप, तप, योग, पूजा कुछ नहीं जानता। मेरा तो बस भजन ही एक आधार है। हे प्रभु! मेरी नाव जब भवँर में पड़ेगी तब आपके बिना कौन किनारे लगाएगा ? आपने बहुतों का उद्धार किया, आपके समान दूसरा कोई तारनहार नहीं है। इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है शरणागत भजन के रूप में मेरी ये रचना:——
भूल न जाना प्रभु मैं सेवक तुम्हारा ।
तुम्हारे बिना मेरा कौन सहारा ।।
मैं जानूँ न जप तप प्रभु जी जोग न पूजा,
भजन हीं है एक अधार न दूजा,
तुम्हारे चरण में प्रभु जी प्रेम हमारा ।
तुम्हारे बिना मेरा कौन सहारा ।।
भूल न जाना प्रभु मैं……….
पड़ेगी भवँर में जब नैया हमारी,
नाहीं खेवैया चले उलटी बयारी,
तुम बिन लगाए प्रभु जी कौन किनारा ।
तुम्हारे बिना मेरा कौन सहारा ।।
भूल न जाना प्रभु मैं……….
बहुतों को तारे प्रभु जी बहुतों उधारे,
बहुतों अधम को निज धाम सिधारे,
तुम बिन न कोई प्रभु जी तारनिहारा ।
तुम्हारे बिना मेरा कौन सहारा ।।
भूल न जाना प्रभु मै……….
रचनाकार :
ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र