राजा राम जी की नगरी सुहावन लागै हो…-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

परम सुहावन नगरी अयोध्या जो छहो ऋतुओं में सुख देने वाली है उसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। उत्तर दिशा में पवित्र सरयू नदी बह रही है, नगर की गलियाँ मणि से ढाले हुए हैं, सभी के घर अति सुंदर और विचित्र हैं जो शिव जी और ब्रह्मा जी के मन को भी मोहित कर रहे हैं। अयोध्यावासी देवताओं के लिए भी जो सुख दुर्लभ है, उस सुख को प्राप्त कर रहे हैं। उसकी शोभा के आगे इन्द्र की पुरी भी तुच्छ हो गई है। घर घर मंगल साज सजा हुआ है। ध्वज, तोरण, पताका सबके घर पर सज रहा है। मणि के दीपक जल रहे हैं। सम्पूर्ण अयोध्या में जैसे आनन्द डेरा डाल दिया हो। प्रतिदिन आँगन में पक्षियों की टोली उतरती है। कोयल और पपीहे अपनी मीठी बोली से सबके मन को मोह ले रहे हैं। जहाँ त्रैलोक्य के स्वामी प्रभु श्रीराम जी और जगद्जननी जानकी जी निवास करतीं हैं वह नगरी भला क्यों न सुहावनी हो ? इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना :——

राजा राम जी की नगरी सुहावन लागै हो ।
सुहावन लागै हो मनभावन लागै हो ।।
राजा राम जी की नगरी………
उत्तर दिशि बहे सरयू मैया,
जेहि तट भ्रमण करत चारो भैया,
सरयू के नीर अति पावन लागै हो ।
मनभावन लागै हो ।।
राजा राम जी की नगरी………
नगर गली गच मणिमय ढाले,
घर सबहीं के रुचिर निराले,
ऊँचे ऊँचे महल सुहावन लागै हो ।
मनभावन लागै हो ।।
राजा राम जी की नगरी………
घर घर मंगल साज सजे हैं,
रंग रंगोली रुचिर रचे हैं,
मणिमय दीप सुहावन लागै हो ।
मनभावन लागै हो ।।
राजा राम जी की नगरी………
उतरे अँगन खगन्ह की टोली,
पिक मैना बोलत मधुबोली,
कोकिल कूक सुहावन लागै हो ।
मनभावन लागै हो ।।
राजा राम जी की नगरी………
मंगल गावैं नगर बधूटी,
राम चरण रज अंजन लूटी,
नित नव अवध बधावन बाजै हो ।
मनभावन लागै हो ।।
राजा राम जी की नगरी………
जहाँ बसत त्रैलोक के स्वामी,
जग जननी जानकी भवानी,
काहे न नगर सुहावन लागै हो ।
मनभावन लागै हो ।।
राजा राम जी की नगरी……..

रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र