प्रभु श्रीराम दुल्हा रूप में विवाह मंडप में हैं। अपरिमित शोभा छाई हुई है। प्रभु की सुन्दरता पर जनकपुर की युवती स्त्रियाँ इतनी मोहित हैं कि अपनी सुध बुध खो चुकी हैं। प्रभु श्रीराम की शोभा का वर्णन कर रही हैं। इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना :——
मत मारो नजरिया से तीर रघुबीर,
मोर जियरा भईल चीर चीर रघुबीर ।
मत मारो नजरिया से………..
श्याम बदन नैना रतनारे ,
अगणित शोभा शरीर रघुबीर ।
मत मारो नजरिया से………..
अरुन अधर मधुबोल सुहावन ,
चारु नासिका कीर रघुबीर ।
मत मारो नजरिया से………..
पीत बसन चारु तिलक सुहावन ,
त्रिवली नाभी गँभीर रघुबीर ।
मत मारो नजरिया से………..
धन धन भाग्य सिया के रघुबर ,
पायो सजनवाँ धीर बीर रघुबीर ।
मत मारो नजरिया से………..
कीर = तोता
त्रिवली = उदर पर बनी तीन रेखाएँ
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रचनाकार :
ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र