हरि चरन कमल मन लागि मेरी…-ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

प्रभु के चरण कमल में जिसकी लगन लग गई उसका बेड़ा पार हो गया। गणिका, गज, अजामिल, केंवट, शबरी, अहिल्या आदि सभी प्रभु के चरण में नेह लगा कर भवसागर पार उतर गए। गिद्धराज जटायु को तो प्रभु ने अपना चतुर्भुज स्वरूप ही प्रदान कर दिया। रावण भी प्रभु से बैर ठान कर भवबंधन से मुक्त हो गया। ऐसे कृपालु प्रभु के चरण कमल में मुझ ब्रह्मेश्वर की भी प्रीत लग गई है। प्रस्तुत है शरणागत भजन के रूप में मेरी ये रचना :——–

हरि चरन कमल मन लागि मेरी ।
मन मधुप निरंतर पान करी ।।
हरि चरन कमल मन………
गणिका गजराज अजामिल की,
जेहि चरन कमल में नेह लगी ।
जेहि चरन कमल को छुअत शिला,
सुंदर शुचि नारी देह धरी ।।
सोइ चरन कमल मन लागि हरी ।
हरि चरन कमल मन………
जेहि चरन कमल केंवट धो कर,
कैवल्य परमपद को पाया ।
जेहि चरन कमल में प्राण त्यागि,
प्रिय गिद्ध चतुर्भुज रूप धरी ।।
सोइ चरन कमल मन लागि हरी ।
हरि चरन कमल मन………
जेहि चरनन सुर नर मुनि सेवत,
जेहि चरनन ब्रह्मेश्वर ध्यावत ।
जेहि चरन कमल से बैर ठानि,
दशग्रीव कठिन भव पार करी ।।
सोइ चरन कमल मन लागि हरी ।
हरि चरन कमल मन………

मधुप = भवँरा । शुचि = पवित्र ।
कैवल्य = मोक्ष । दशग्रीव = रावण ।

..

रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र