डिजिटल मीडिया एथिक्स 2021 : अनुशासन से ही बचेगी डिजिटल पत्रकारिता की साख

– पूर्णेन्दु पुष्पेश. 

किसी भी समाज, संस्था या देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए केवल आज़ादी ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उस आज़ादी को दिशा देने वाली नियमावली भी उतनी ही ज़रूरी होती है। नियम किसी पर बोझ नहीं होते, बल्कि वे उस आलंब (pillar) की तरह होते हैं, जिस पर पूरी व्यवस्था टिकी रहती है। अगर हर व्यक्ति या हर संस्था अपनी मर्ज़ी से स्वच्छंद और उच्छृंखल होकर काम करने लगे, तो व्यवस्था नहीं चलती, बल्कि अराजकता पैदा होती है। यही सिद्धांत आज के डिजिटल मीडिया पर भी पूरी तरह लागू होता है।

डिजिटल मीडिया एथिक्स 2021 को इसी पृष्ठभूमि में समझने की ज़रूरत है। यह नियम किसी सरकार या किसी राजनीतिक दल को बचाने के लिए नहीं, बल्कि देश, समाज और पत्रकारिता की साख को बचाने के लिए बनाए गए हैं। सरकारें आती–जाती रहती हैं, लेकिन सरकार द्वारा बनाए गए नियम देशहित को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं, न कि किसी पार्टी के हित में। इस बुनियादी अंतर को न समझना ही आज डिजिटल पत्रकारिता में सबसे बड़ी भ्रांति बन चुका है।

डिजिटल मीडिया के तेज़ विस्तार ने लोकतंत्र को नई ताक़त दी है, लेकिन इसी के साथ कई गंभीर विकृतियाँ भी सामने आई हैं। आज हालात यह हैं कि एक डमी माइक, एक फेसबुक पेज या एक यूट्यूब चैनल बनाकर कुछ लोग खुद को पत्रकार घोषित कर देते हैं। ये तथाकथित पत्रकार न तो किसी संस्थान से जुड़े होते हैं, न किसी आचार संहिता को मानते हैं और न ही किसी जवाबदेही के दायरे में आते हैं। परिणामस्वरूप, यत्र–तत्र वसूली, धमकी, ब्लैकमेलिंग और प्रशासन को बदनाम करने जैसी शिकायतें आम हो गई हैं। दुर्भाग्य यह है कि इन हरकतों की वजह से असली और ईमानदार पत्रकारों की साख पर भी सवाल खड़े होते हैं।

ऐसे में डिजिटल मीडिया एथिक्स 2021 एक आवश्यक सुधार के रूप में सामने आता है। यह नियम स्पष्ट करता है कि डिजिटल न्यूज़ पोर्टल भी वही नैतिक और पेशेवर मानक अपनाएँ, जो वर्षों से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनाते आए हैं। यह व्यवस्था पत्रकारिता की स्वतंत्रता को खत्म नहीं करती, बल्कि उसे जवाबदेही से जोड़ती है। स्वतंत्रता और जवाबदेही साथ–साथ चलें, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है।

एक बेहद महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी है कि सभी डिजिटल न्यूज़ पोर्टल को किसी न किसी स्व-नियामक निकाय (SRB – Self Regulatory Body) के अंतर्गत काम करना होगा। यह देशहित में है। SRB का मतलब सरकारी सेंसरशिप नहीं, बल्कि पत्रकारिता के भीतर से ही अनुशासन विकसित करना है। जब मीडिया खुद अपने घर को दुरुस्त करेगा, तो बाहरी हस्तक्षेप की गुंजाइश स्वतः कम होगी।

यहाँ एक ज़रूरी और व्यावहारिक सुझाव भी सामने आता है। आज ऐसे कई युवा हैं जो किसी निबंधित या बड़े मीडिया संस्थान से ना जुड़ पाने की मजबूरी में अपना डिजिटल न्यूज़ पोर्टल शुरू कर लेते हैं। ऐसे युवाओं को हतोत्साहित करने की नहीं, बल्कि दिशा देने की ज़रूरत है। यदि वे किसी सरकारी मान्यता प्राप्त SRB वाले एसोसिएशन से अपना पंजीकरण करवा लें, पत्रकारिता से जुड़ी कोई छोटी या बड़ी डिग्री/डिप्लोमा प्राप्त कर लें और एथिक्स कोड को स्वीकार कर लें, तो उन्हें खुलकर और बिना किसी सरकारी डर के पत्रकारिता करने में मदद मिलेगी।
पत्रकारिता को केवल ग्लैमर के रूप में देखना और बात है, लेकिन पत्रकारिता को करियर, सामाजिक ज़िम्मेदारी और देशसेवा के रूप में अपनाना बिल्कुल दूसरी बात है। एथिक्स और प्रशिक्षण के साथ किया गया डिजिटल पत्रकारिता न सिर्फ़ सुरक्षित है, बल्कि सम्मानजनक भी है।

आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि डिजिटल मीडिया के लिए कोई प्रभावी अनिवार्य पंजीकरण व्यवस्था नहीं है। कोई भी व्यक्ति रातों-रात न्यूज़ पोर्टल खोल लेता है और खुद को मीडिया हाउस घोषित कर देता है। न कोई वैधानिक पहचान, न कोई रिकॉर्ड, न कोई जिम्मेदारी। इसी खालीपन का फायदा झोलाछाप किस्म के लोग उठा रहे हैं। यदि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB), भारत सरकार के अंतर्गत डिजिटल न्यूज़ पोर्टल का अनिवार्य पंजीकरण शुरू हो जाता है, तो ऐसे फर्जी तत्वों पर स्वतः लगाम लगेगी। इससे सही पत्रकारों को एक तरह से संरक्षण मिलेगा और समाज में उनके प्रति विश्वास मजबूत होगा।

एक गंभीर प्रश्न जिला प्रशासन की भूमिका पर भी खड़ा होता है। अक्सर देखने में आता है कि अपनी योजनाओं, बैठकों और उपलब्धियों को अधिक से अधिक प्रचार दिलाने के लिए जिला प्रशासन खुद सरकारी नियमों को ताक पर रखकर अनिबंधित न्यूज़ पोर्टल, फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनलों को अपनी मीडिया सूची में शामिल कर लेता है। यह न केवल गलत परंपरा है, बल्कि फर्जी पत्रकारिता को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा भी देता है। इस प्रवृत्ति पर कड़ाई से रोक लगनी चाहिए और प्रशासन को केवल पंजीकृत व मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थानों के साथ ही आधिकारिक संवाद रखना चाहिए।

जिस तरह प्रिंट मीडिया बिना PRGI (पूर्व में RNI) के नहीं चल सकता, उसी तरह अब समय आ गया है कि डिजिटल न्यूज़ मीडिया भी बिना MIB में पंजीकरण के संचालित न हो सके। यह कदम न केवल पत्रकारिता को व्यवस्थित करेगा, बल्कि डिजिटल मीडिया को एक वैधानिक, विश्वसनीय और सम्मानजनक पहचान भी देगा।

झारखंड जैसे राज्यों में, जहाँ डिजिटल मीडिया ने ज़मीनी मुद्दों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहाँ यह व्यवस्था और भी ज़रूरी हो जाती है। नियम और एथिक्स से बंधी डिजिटल पत्रकारिता अधिक जिम्मेदार होगी, अफवाहों पर रोक लगेगी और जनता का भरोसा मजबूत होगा।

वस्तुतः यह समझना होगा कि नियम विरोध के लिए नहीं, व्यवस्था के लिए होते हैं। डिजिटल मीडिया एथिक्स 2021 को डर या संदेह की नज़र से नहीं, बल्कि एक आवश्यक सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए। बिना नियम की आज़ादी अराजकता बन जाती है, जबकि अनुशासन के साथ आज़ादी ही सच्चे लोकतंत्र और सशक्त पत्रकारिता की असली पहचान होती है।

Advertisements
Ad 7