प्रस्तुत है राधा जी की विरह वेदना पर मेरी ये रचना :——.
बड़ा हीं छलिया हो ब्रजनाथ ,
नाथ क्यूँ छोड़ गए मोर हाथ ।
आवन कहि गए अजहु न आए ,
एक पल मोरा एक जुग जाए ,
कर दियो मोहे अनाथ ।
नाथ क्यूँ छोड़ गए मोर हाथ ।
बड़ा हीं छलिया हो…………
मैं बिरहन हूँ बिरह कि मारी ,
बाट निहारत रैना सारी ,
कब आओगे नाथ ।
नाथ क्यूँ छोड़ गए मोर हाथ ।
बड़ा हीं छलिया हो…………
काहे को तोसे प्रीत लगाई ,
अब तो बैठि रहो पछताई ,
अब तो आओ नाथ ।
नाथ क्यूँ छोड़ गए मोर हाथ ।
बड़ा हीं छलिया हो…………
रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

