एक स्त्री का पती परदेश में है। वह होली के अवसर पर अपने प्रियतम के आने की प्रतीक्षा कर रही है और ज्यों ज्यों होली का दिन नजदीक आ रहा है त्यों त्यों उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही है। अपनी सखी से कहती है कि हे सखी प्रियतम अब तक आए नहीं मैं होली किसके साथ खेलूँगी ? हे सखी मुझे होली सुहा नहीं रहा है। इसी बीच आँगन में कौवा उचरने लगता है। सखी से कहती है कि हे सखी देखो यह कौवा प्रियतम के आने का अगम जना रहा है। वह प्रसन्न हो जाती है और कहती है कि अब पिया के संग होली खेलूँगी। इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना :—-
पिया मोर भए सखी परदेशी ,
होली केहि संग खेलौं री ।
बहुत दिनन से आश लगायो ,
फागुन में पिय अवशिहिं आयो ,
पिय नहिं आयो री ।
होली केहि संग खेलौं री ।
पिया मोर भए सखी………..
बिरहा के दुख अब न सहाए ,
होली हे सखी मोहे न भाए ,
तड़पत जियरा री ।
होली केहि संग खेलौं री ।
पिया मोर भए सखी………..
एहि बिच कागा उचरन लागै ,
पिय के आवन अगम जनावै ,
पिय मोरे आयो री ।
होली पिय संग खेलौं री ।
पिया मोर भए सखी………..
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रचनाकार :

ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

