राज्यसभा चुनाव: सीटों का मुकाबला नहीं, गठबंधन की परीक्षा

– पूर्णेन्दु पुष्पेश

झारखंड में राज्यसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। दो सीटों के लिए होने वाला यह चुनाव केवल संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधि भेजने की संवैधानिक प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि राज्य की मौजूदा राजनीति की दिशा और दशा को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। इस चुनाव में जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं, वहीं इसके बहाने कई ऐसे राजनीतिक प्रश्न भी सामने आ रहे हैं जो आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।

पूर्वी भारत के राजनीतिक परिदृश्य में झारखंड की स्थिति इस समय विशेष महत्व रखती है। हाल के वर्षों में बिहार और पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। इन परिवर्तनों के बीच झारखंड ऐसा राज्य बनकर उभरा है जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाला गठबंधन अब भी मजबूती के साथ सत्ता में बना हुआ है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में गठबंधन ने हाल ही में जनता का विश्वास दोबारा हासिल किया है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव इस बात की पहली गंभीर परीक्षा साबित हो सकता है कि सत्ता में मौजूद यह गठबंधन भीतर से कितना मजबूत और एकजुट है।

विधानसभा के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर साफ दिखाई देती है। 81 सदस्यीय विधानसभा में झामुमो, कांग्रेस, राजद और भाकपा माले को मिलाकर सत्तारूढ़ गठबंधन के पास 56 विधायकों का समर्थन है। दूसरी ओर भाजपा और उसके सहयोगी दलों की संख्या 24 के आसपास है। सामान्य परिस्थितियों में यह गणित दोनों सीटों पर सत्ता पक्ष की आसान जीत की ओर संकेत करता है। लेकिन राजनीति केवल संख्याओं का खेल नहीं होती। कई बार परिस्थितियां और समीकरण ऐसे मोड़ ले लेते हैं जहां अंकगणित से अधिक महत्व राजनीतिक प्रबंधन और आपसी विश्वास का हो जाता है।

यहीं से इस चुनाव की वास्तविक दिलचस्पी शुरू होती है। पहली सीट पर झामुमो का दावा लगभग निर्विवाद माना जा रहा है, लेकिन दूसरी सीट को लेकर कांग्रेस अपनी दावेदारी मजबूती से रख रही है। कांग्रेस का तर्क है कि गठबंधन धर्म निभाने में उसने हमेशा अग्रणी भूमिका निभाई है और विभिन्न चुनावों में झामुमो को पूरा सहयोग दिया है। इसलिए इस बार उसे भी सम्मानजनक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। पार्टी के भीतर यह भावना भी दिखाई देती है कि गठबंधन की दीर्घकालिक मजबूती के लिए सभी सहयोगियों की राजनीतिक अपेक्षाओं और आत्मसम्मान का ध्यान रखना आवश्यक है।

इसी बीच भाजपा ने चुनावी मुकाबले को और रोचक बना दिया है। संख्या बल उसके पक्ष में नहीं होने के बावजूद पार्टी ने एक सीट जीतने का दावा किया है। राजनीतिक दृष्टि से यह दावा केवल चुनावी बयान भर नहीं माना जा सकता। इसके पीछे सत्ता पक्ष के भीतर संभावित असंतोष या मतभेदों को अवसर में बदलने की रणनीति भी देखी जा रही है। भाजपा जानती है कि यदि मुकाबला बहुकोणीय होता है और गठबंधन के भीतर कहीं भी असहजता उभरती है, तो चुनाव का स्वरूप अप्रत्याशित हो सकता है।

दरअसल, यह चुनाव झामुमो और कांग्रेस के संबंधों की भी एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय भाषाओं के मुद्दे से लेकर विभिन्न नीतिगत विषयों तक दोनों दलों के बीच मतभेदों की चर्चा समय-समय पर होती रही है। समन्वय समिति के गठन जैसे मुद्दे भी लंबे समय से लंबित हैं। सार्वजनिक मंचों पर दोनों दल गठबंधन की मजबूती का दावा करते रहे हैं, लेकिन टिकट और प्रतिनिधित्व का प्रश्न हमेशा राजनीतिक रिश्तों की वास्तविक स्थिति को सामने ले आता है। यही कारण है कि राज्यसभा की यह कवायद केवल उम्मीदवार तय करने तक सीमित नहीं रह गई है।

गठबंधन के एक अन्य सहयोगी राजद की नाराजगी भी इस चर्चा का हिस्सा बन चुकी है। चार विधायक होने के बावजूद परामर्श प्रक्रिया में पर्याप्त महत्व नहीं मिलने की शिकायत यह संकेत देती है कि गठबंधन के भीतर संवाद और समन्वय को और मजबूत करने की आवश्यकता है। सत्ता की राजनीति में संख्या जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतना ही महत्वपूर्ण सहयोगियों का विश्वास भी होता है।

हालांकि झामुमो नेतृत्व पूरी स्थिति को लेकर आश्वस्त दिखाई देता है। पार्टी का मानना है कि उसके पास दोनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त संख्या बल मौजूद है और उम्मीदवारों के चयन पर अंतिम निर्णय आपसी सहमति से हो जाएगा। यह विश्वास स्वाभाविक भी है, क्योंकि विधानसभा में गठबंधन की स्थिति मजबूत है। फिर भी राजनीति में केवल बहुमत ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उस बहुमत को एकजुट बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होता है।

अंततः यह राज्यसभा चुनाव झारखंड की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक साबित हो सकता है। चुनाव परिणाम चाहे जो हों, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि गठबंधन इस पूरी प्रक्रिया को किस तरह संभालता है। यदि सहयोगी दलों के बीच संवाद, सम्मान और संतुलन बना रहता है तो यह गठबंधन की मजबूती का संदेश देगा। लेकिन यदि सीटों के बंटवारे और प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष बढ़ता है, तो उसका असर आने वाले राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

इसलिए यह चुनाव केवल दो सांसद चुनने की प्रक्रिया नहीं है। यह सत्ता पक्ष की राजनीतिक परिपक्वता, विपक्ष की रणनीतिक क्षमता और झारखंड की बदलती राजनीति को समझने का एक अवसर भी है। आने वाले दिनों में नामांकन, उम्मीदवारों की घोषणा और राजनीतिक गतिविधियां यह स्पष्ट कर देंगी कि राज्य का सियासी परिदृश्य किस दिशा में आगे बढ़ने वाला है। फिलहाल इतना तय है कि इस बार राज्यसभा का चुनाव सामान्य नहीं, बल्कि कई मायनों में महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश देने वाला चुनाव साबित होगा।