बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति का अवसान और अहंकार का महा-पतन

 


– विजय कुमार झा
वरिष्ठ पत्रकार, बोकारो (झारखंड)।

 

एक पुरानी कहावत है कि पाप का घड़ा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, एक न एक दिन उसका फूटना तय है। जब सत्ता के गलियारों में अहंकार सिर चढ़कर बोलने लगे और लोकतांत्रिक मूल्यों को दरकिनार कर केवल एक विशेष वर्ग के तुष्टिकरण को ही सत्ता सुख भोगने का एकमात्र जरिया मान लिया जाए, तो विनाश की पटकथा अपने आप लिखी जाने लगती है। आज पश्चिम बंगाल की भूमि से जो राजनीतिक और सामाजिक संदेश निकल रहा है, वह देश के उन तमाम राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए एक खुली चेतावनी है, जो तुष्टिकरण की राजनीति के सहारे लंबे समय तक सत्ता का आनंद लेना चाहते हैं। पश्चिम बंगाल में पिछले 15 वर्षों से सत्तासीन ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का वर्तमान हश्र यह स्पष्ट करता है कि अहंकार और कुशासन का अंत कितना भयावह होता है। जिस तृणमूल को ममता बनर्जी ने कभी वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाकर खड़ा किया था, आज वह खुद अपनी ही गलतियों, अंदरूनी कलह और तुष्टिकरण के आत्मघाती जाल में फंसकर जड़ से उखड़ चुकी है और एक तिनके की तरह बिखर गई है।

भय का माहौल और सगे भाई का विद्रोह

इस महा-पतन की शुरूआत तब हुई, जब पार्टी के भीतर अलोकतांत्रिक तरीके से तानाशाही और भय का माहौल बनाया गया। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता रिजू दत्ता के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में ममता बनर्जी ने पार्टी की पूरी कमान अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के हाथों में सौंप दी थी। इसके बाद पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र पूरी तरह समाप्त हो गया। कॉरपोरेट संस्थाओं के माध्यम से टिकटों की खुलेआम खरीद-बिक्री होने लगी और वरिष्ठ सांसदों व विधायकों को बंधुआ गुलामों की तरह प्रताड़ित किया जाने लगा। विरोध की आवाज उठाने वालों पर पुलिसिया कार्रवाई, झूठे मुकदमे और गांजे के केस लाद दिए जाते थे। इस दमघोंटू माहौल का परिणाम यह हुआ कि ममता बनर्जी के अपने ही घर में विद्रोह की आग भड़क उठी। उनके सगे छोटे भाई स्वप्न बनर्जी ने सिस्टम से त्रस्त होकर उनके खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया और ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से अपने ही भाई से सारे रिश्ते तोड़ लिए।

विधायकों की बगावत और जालसाजी का भंडाफोड़

पार्टी के भीतर पनप रहा यह आक्रोश अंतत: एक बड़े राजनीतिक भूचाल के रूप में सामने आया है। टीएमसी के 80 में से 58 से अधिक विधायकों ने अभिषेक बनर्जी के तानाशाही रवैये और अहंकार के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। इन बागी विधायकों ने विधानसभा में विधायक दल का अलग नेता चुन लिया है और विधानसभा अध्यक्ष ने भी इस गुट को आधिकारिक मान्यता दे दी है। इन बागी विधायकों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। इस बगावत के पीछे मुख्य कारण विधानसभा के भीतर नेता प्रतिपक्ष के चयन में अभिषेक बनर्जी द्वारा किया गया बड़ा फर्जीवाड़ा था, जिसमें कई विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर कर विधानसभा सचिवालय को पत्र भेजा गया था। इस गंभीर जालसाजी के मामले में अब सीआईडी जांच चल रही है और अभिषेक बनर्जी पर कानूनी शिकंजा कस चुका है। उधर, दिल्ली में टीएमसी के ज्यादातर सांसदों ने भी ममता के खिलाफ विद्रोह कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो ममता बनर्जी का यह हश्र देश के अन्य उन क्षत्रपों जैसा ही होने जा रहा है, जिन्होंने केंद्रीय नेतृत्व और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को चुनौती देने की भूल की थी। जैसे महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के हाथ से उनकी शिवसेना और शरद पवार के हाथ से उनकी एनसीपी निकल गई और उनके अपने ही लोग पूरी पार्टी, चुनाव चिन्ह व झंडा लेकर चले गए, ठीक वही स्थिति आज बंगाल में दोहराई जा रही है। ममता बनर्जी को अब अपना राजनीतिक अस्तित्व खतरे में दिखाई दे रहा है, जिसके कारण वे जनता और अदालत दोनों जगह अपनी साख खो चुकी हैं।

मुस्लिम वोट बैंक का बिखराव और तुष्टिकरण का अंत

सबसे धमाकेदार और आंखें खोलने वाला पहलू यह है कि जिस मुस्लिम वोट बैंक को ममता बनर्जी अपनी बपौती मानती थीं और तुष्टिकरण की राजनीति के चरम पर जाकर बहुसंख्यक समाज को लगातार प्रताड़ित करती थीं, वही वोट बैंक आज उनसे छिटक गया है। विद्रोह करने वाले विधायकों में 17 मुस्लिम विधायक शामिल हैं, जो अब खुलकर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के थोपे गए फैसलों के खिलाफ मुखर हो रहे हैं। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि तुष्टिकरण की राजनीति की एक मियाद होती है। जब आप जनता को अपनी जागीर समझने लगते हैं, तो जनता चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, आपको सत्ता के शीर्ष से फर्श पर लाकर पटक देती है।

भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा और नोटों को खाती दीमक

ममता बनर्जी के शासनकाल में भ्रष्टाचार और अनैतिकता किस हद तक अपनी सीमाएं लांघ चुकी थी, इसका एक घिनौना उदाहरण कोलकाता के ऐतिहासिक सुरेंद्रनाथ कॉलेज के यूनियन रूम से मिला है। वहां सफाई के दौरान दो सूटकेस बरामद हुए, जो 500-500 रुपये के नोटों की गड्डियों से ठसाठस भरे हुए थे, जिन्हें खर्च करने की जगह न मिलने के कारण दीमक खा चुके थे। इसी यूनियन रूम के पीछे अय्याशी और अनैतिक गतिविधियों के अड्डे बने हुए थे, जिन पर टीएमसी छात्र परिषद का ताला लटका रहता था। जनता का खून चूसकर कमाए गए इस कटमनी के काले धन का ऐसा हश्र यह साबित करता है कि अनैतिक तरीके से अर्जित संपत्ति कभी फलीभूत नहीं होती। आज स्थिति यह है कि टीएमसी के कई पार्षद और नेता गिरफ्तार हो रहे हैं, कई दफ्तरों की चाबियां लोग डर के मारे विपक्षी दलों को सौंप कर भाग रहे हैं और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम जैसे खासमखास नेताओं ने अपने पदों से इस्तीफे दे दिए हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ और राष्ट्रद्रोह का मुकदमा

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक और राष्ट्र-विरोधी पहलू देश की सुरक्षा से खिलवाड़ का था। चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल के हकीमपुर बॉर्डर और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों से हजारों की संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के वापस भागने के वीडियो साक्ष्य सामने आ रहे हैं। ये घुसपैठिए स्वयं कैमरे पर स्वीकार कर रहे हैं कि वे वर्षों से अवैध रूप से भारत में रह रहे थे और टीएमसी के निचले स्तर के नेताओं ने वोट बैंक के लालच में उन्हें यहां बसने और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में मदद की थी। सत्ता में बने रहने के लिए देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता को ताक पर रख देना एक अक्षम्य अपराध है। जब ममता बनर्जी ने एक राजनीतिक रैली में गृह मंत्री का नाम बांग्लादेशी नागरिक उस्मान हादी की हत्या के मामले में घसीटा, तो उनके खिलाफ राष्ट्रद्रोह और भड़काऊ भाषण का मामला दर्ज हो गया।

तुष्टिकरण के सौदागरों के लिए सीधा संदेश

इस पूरे परिदृश्य से देश के तमाम राजनीतिक दलों के लिए एक स्पष्ट संदेश निकलता है कि देश की सुरक्षा, अस्मिता और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को कुचलकर केवल एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण के भरोसे सत्ता का सुख भोगने का दौर अब समाप्त हो चुका है। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को मंचों से गाली देना, उन्हें चोर, दंगाबाज या फासिस्ट कहना और भारतीय संघ (यूनियन आॅफ इंडिया) को खुलेआम चुनौती देना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं है। जो नेता यह सोचते हैं कि वे गुंडागर्दी, भय के माहौल और कटमनी के साम्राज्य के बल पर हमेशा राज करेंगे, उन्हें बंगाल के इस बिखरते साम्राज्य को ध्यान से देखना चाहिए। जनतंत्र की असली ताकत यही है कि जब जनता का सब्र टूटता है, तो बड़े-बड़े तख्त और ताज हवा में उड़ जाते हैं।