– पूर्णेन्दु पुष्पेश
देश की सुरक्षा का मोर्चा अब केवल सीमा तक सीमित नहीं है। सीमा पर जवान दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखता है, लेकिन देश के भीतर करोड़ों मोबाइल स्क्रीन पर चल रही सूचनाएं भी समाज की सोच को प्रभावित कर रही हैं। फर्क इतना है कि सीमा का खतरा दिखाई देता है, डिजिटल खतरा कई बार सच का चेहरा लगाकर सामने आता है।
सोशल मीडिया ने हर नागरिक को अपनी बात कहने का मंच दिया है। यह लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन यही मंच झूठ, अफवाह और दुष्प्रचार के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है। पुराना वीडियो नई घटना बन जाता है, तस्वीर का संदर्भ बदल दिया जाता है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से नकली आवाज तथा वीडियो तैयार कर दिए जाते हैं। तकनीक अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब उसका इस्तेमाल लोगों को भ्रमित करने और समाज के भरोसे को कमजोर करने के लिए किया जाता है।
इसका सबसे बड़ा असर युवाओं पर पड़ सकता है। युवा किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। उनकी सोच और ऊर्जा देश निर्माण की दिशा में लगे तो राष्ट्र मजबूत होता है। लेकिन यदि उन्हें अधूरी जानकारी, झूठे प्रचार और लगातार दोहराए जा रहे भ्रामक नैरेटिव के जरिए प्रभावित किया जाए, तो नुकसान केवल किसी एक संस्था या व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इसका असर समाज के भरोसे और देश की एकता तक पहुंच सकता है।
सोशल मीडिया पर भारत और उसकी संस्थाओं को लेकर तरह-तरह के नैरेटिव चलाए जाते हैं। राजनीतिक दलों और अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े लोगों पर भी ऐसे नैरेटिव को आगे बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं। इन आरोपों की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन नागरिक की जिम्मेदारी इससे अलग है। उसे किसी भी सामग्री को केवल इसलिए सच नहीं मानना चाहिए कि वह तेजी से वायरल हो रही है। युवाओं को खास तौर पर यह समझना होगा कि वायरल होना और विश्वसनीय होना एक बात नहीं है।
दुष्प्रचार की सबसे बड़ी ताकत उसकी रफ्तार है। एक सनसनीखेज पोस्ट भावनाओं को उकसाती है। लोग स्रोत देखे बिना उसे आगे बढ़ाते हैं और कुछ ही मिनट में वह हजारों लोगों तक पहुंच जाती है। सच सामने आने में समय लगता है, लेकिन झूठ को फैलने में कुछ सेकंड ही काफी होते हैं। इसलिए डिजिटल दुनिया में रुकना भी जिम्मेदारी है।
यहां एक फर्क समझना जरूरी है। सरकार से सवाल करना, नीतियों की आलोचना करना और व्यवस्था की कमियां उजागर करना लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है। असहमति को दुष्प्रचार कहना भी उचित नहीं। लेकिन जानबूझकर झूठी सूचना फैलाना, फर्जी सामग्री को असली बताना या समाज में वैमनस्य पैदा करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वस्थ इस्तेमाल नहीं है। लोकतंत्र को आलोचना चाहिए, भ्रम नहीं; सवाल चाहिए, झूठ नहीं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। नकली आवाज और वीडियो तैयार करना आसान हो रहा है। ऐसे में सरकार और तकनीकी संस्थाओं को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, लेकिन समाज भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। किसी वीडियो का स्रोत देखना, तस्वीर का संदर्भ जांचना, संवेदनशील दावे की पुष्टि करना और संदिग्ध सामग्री को आगे न बढ़ाना अब डिजिटल शिष्टाचार नहीं, नागरिक जिम्मेदारी है।
भारत जैसे विविध देश की सबसे बड़ी ताकत सामाजिक एकता और आपसी विश्वास है। दुष्प्रचार इसी भरोसे को निशाना बनाता है। जब झूठ समुदायों के बीच दूरी पैदा करता है, संस्थाओं के प्रति अविश्वास बढ़ाता है या युवाओं के मन में देश के प्रति निराशा भरता है, तब उसका असर एक पोस्ट से कहीं आगे चला जाता है।
इसलिए राष्ट्रहित केवल सीमा पर खड़े जवान की जिम्मेदारी नहीं है। मोबाइल हाथ में रखने वाला नागरिक भी इस जिम्मेदारी का हिस्सा है। आज देश का एक मोर्चा हमारी स्क्रीन पर है। वहां बंदूक नहीं, सूचना है; बारूद नहीं, शब्द हैं; और लड़ाई दिखाई नहीं देती, लेकिन उसका असर पूरे समाज पर पड़ सकता है।
इस मोर्चे पर हर नागरिक पहरेदार है। अगली बार कोई सनसनीखेज संदेश सामने आए तो तुरंत शेयर करने के बजाय एक पल रुकिए। स्रोत देखिए, तथ्य जांचिए और फिर फैसला कीजिए। क्योंकि देश के खिलाफ फैलाया गया झूठ तभी ताकतवर बनता है, जब हम उसे अपनी उंगली से आगे बढ़ाते हैं। सीमा पर जवान देश की भौगोलिक सीमा की रक्षा करता है; मोबाइल पर जागरूक नागरिक देश के सामाजिक और सूचना-विश्वास की रक्षा करता है। आज की देशभक्ति का एक सरल मंत्र यही है -पहले सत्य, फिर शेयर।

