वर्दी को अपमान से बचाना होगा, पुलिस की संवैधानिक ताकत बढ़ानी होगी

– Purnendu Pusshpesh

कानून का राज तभी कायम रह सकता है, जब कानून लागू कराने वाली संस्था खुद भय और दबाव से मुक्त हो। जिस पुलिस पर सड़क से लेकर संसद तक व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी है, अगर वही नेताओं की नाराजगी, राजनीतिक रसूख और भीड़ की हिंसा के डर में काम करे, तो कानून का इकबाल कैसे कायम रहेगा? दिल्ली में कथित आंदोलन के दौरान महिला पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार और एक पुलिसकर्मी को पीछे से लात मारे जाने के दृश्य इसी गंभीर सवाल को सामने लाते हैं। वर्दी पहनने वालों के साथ ऐसा व्यवहार शर्मनाक है। सवाल केवल दुर्व्यवहार करने वालों का नहीं, उस व्यवस्था का भी है जिसमें पुलिस को कानून लागू करने की जिम्मेदारी तो दी जाती है, लेकिन जरूरत पड़ने पर कठोर कदम उठाने का पर्याप्त भरोसा नहीं मिलता।

गांधी परिवार हो या कोई दूसरा राजनीतिक परिवार, किसी को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि राजनीतिक विरासत उसे कानून से ऊपर खड़ा कर देती है। शहजादा और शहजादी का रुतबा हासिल कर लेने का अर्थ यह नहीं कि वे महिला पुलिसकर्मियों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार करें। वीडियो में जिस तरह महिला पुलिसकर्मी के साथ अनुचित व्यवहार किए जाने का आरोप सामने आया है, उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो कानून के मुताबिक कार्रवाई भी होनी चाहिए। महिला पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी कर रही थीं। उन्हें इसके बदले अपमान या शारीरिक दुर्व्यवहार जैसा कोई ‘पुरस्कार’ नहीं मिलना चाहिए था। आखिर प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई में हिचकिचाहट क्यों दिखाई देती है? क्या पुलिस को भी यह सोचना पड़ता है कि सामने खड़े व्यक्ति पर हाथ डालने से किसकी नाराजगी मोल लेनी पड़ेगी?

आंदोलन करना हर भारतीय का अधिकार है। सरकार का विरोध करना, सवाल पूछना और अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरना लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाने, पुलिसकर्मियों को पीटने या महिला पुलिसकर्मियों को अपमानित करने की छूट नहीं मिल सकती। पुलिस को घटनास्थल पर विधि-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात किया जाता है, गाली सुनने, पिटाई खाने और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के हाथों अपमानित होने के लिए नहीं। अगर कानून लागू कराने वाली संस्था ही भीड़ के सामने असहाय खड़ी रहेगी, तो कानून का भय किसे रहेगा?

पुलिस के सामने यही दोहरी चुनौती है। जहां अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई जरूरी होती है, वहां राजनीतिक हस्तक्षेप, तबादले का डर और कार्रवाई के बाद खड़े होने वाले विवाद उसके कदम रोक सकते हैं। प्रभावशाली आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले संभावित राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिसाब लगाना पड़े, तो निष्पक्ष कानून व्यवस्था की उम्मीद कैसे की जा सकती है? देश में पुलिसकर्मियों पर हमले और ड्यूटी में बाधा की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं। पुलिस से हर हाल में शांति बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन जब उसी पर हमला होता है, तब कार्रवाई को लेकर वैसी ही तत्परता हमेशा दिखाई नहीं देती। यह दोहरा रवैया खत्म होना चाहिए।

अब समय आ गया है कि भारतीय पुलिस को अधिक संवैधानिक ताकत और राजनीतिक दबाव से वास्तविक मुक्ति दी जाए। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को कानून के मुताबिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता, स्थिर कार्यकाल और संस्थागत संरक्षण मिलना चाहिए। ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमला करने और सरकारी काम में बाधा डालने वालों के खिलाफ बिना भेदभाव कार्रवाई हो। गिरफ्तारी कानूनन जरूरी हो, तो सामने वाले की राजनीतिक पहचान पुलिस के रास्ते की बाधा नहीं बननी चाहिए। पुलिस सुधार का अर्थ केवल आधुनिक हथियार, वाहन और तकनीक देना नहीं है; इसका अर्थ पुलिस को कानून लागू करने का आत्मविश्वास और अधिकार देना भी है।

कुछ लोगों को डर है कि ज्यादा अधिकार मिलने पर पुलिस निरंकुश हो जाएगी। लेकिन क्या इसका समाधान पुलिस को राजनीतिक दबाव में कमजोर बनाए रखना है? निरंकुशता रोकने का उपाय स्पष्ट जवाबदेही, स्वतंत्र निगरानी और कानून के उल्लंघन पर कार्रवाई है, न कि पुलिस को निर्णय लेने से पहले ही भयभीत कर देना। पुलिस की ज्यादती पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन ईमानदार अधिकारी का मनोबल राजनीतिक दबाव में तोड़ना भी उतना ही गलत है। उसे नागरिक के सामने जवाबदेह और अपराधी के सामने कानून के अधिकार से लैस होना चाहिए।

समय आ गया है। देश के कानून निर्माताओं को पुलिस के सम्मान और अधिकारों के प्रति भी संवेदनशील होना होगा। वर्दी पहनने वाले भी इसी देश के नागरिक हैं। वे किसी के बेटे-बेटी, भाई-बहन और माता-पिता हैं। उनके अधिकारों और गरिमा की रक्षा करना भी राष्ट्र का दायित्व है। डरी-सहमी पुलिस से कानून का राज नहीं चल सकता। पुलिस को राजनीतिक भय से मुक्ति, निर्णय लेने की संवैधानिक ताकत और ड्यूटी के दौरान सम्मान देना अब विकल्प नहीं, जरूरत है।

अगर पुलिस को थोड़ी स्वतंत्रता मिल जाए, एक यूनिफॉर्म पुलिस कोड लागू कर दिया जाए, एक पुलिस चार्टर लागू हो जाए तो ऐसी अराजकताओं से पार पाना आसान हो जाए।  लोकतंत्र में पुलिस की मजबूती जनता की कमजोरी नहीं, उसके अधिकारों की सुरक्षा है। वर्दी का सम्मान तभी बचेगा, जब कानून तोड़ने वाले को यह भरोसा नहीं रहेगा कि राजनीतिक रसूख उसे कार्रवाई से बचा लेगा।