– PURNENDU PUSSHPESH
आतंकवाद के सामने सबसे पहले साफ खड़ा होना पड़ता है। वहां शब्दों में अगर मगर शुरू हो जाए, तो सवाल सिर्फ राजनीतिक बयान का नहीं रहता। फिर यह संदेह पैदा होता है कि क्या आतंकवाद की निंदा भी वोट और राजनीतिक सुविधा देखकर होगी? लोकतंत्र में सरकार की आलोचना जरूरी है, लेकिन आतंकवाद के सवाल पर अस्पष्टता विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है।
फ्लाईदुबई की उड़ान में भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार के साथ जो हुआ, उसने इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है। सह-पायलट अल-हम्मामी ने उन पर हमला किया और विमान तेजी से नीचे गिरा। घायल होने के बावजूद मच्छार ने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में कामयाबी हासिल की। दूसरे पायलटों और यात्रियों ने स्थिति संभाली और विमान सुरक्षित उतरा। विमान में 174 यात्री थे। जरा सोचिए, अगर उस क्षण मच्छार ने हिम्मत खो दी होती तो क्या होता? एक विमान को हवा में हथियार बनाकर सैकड़ों लोगों की जान लेने की कोशिश को विफल करने वाला यह साहस सामान्य घटना नहीं है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में भी उनके सम्मान में प्रस्ताव लाया गया और घटना को संभावित आतंकी हमले के रूप में गंभीरता से लिया गया।
दुनिया ने 9/11 देखा है। चार विमानों के अपहरण के जरिए अमेरिका पर हुआ वह हमला केवल हजारों लोगों की मौत की त्रासदी नहीं था, उसने पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था बदल दी। मुंबई का 26/11 भी हमारे सामने है। इसलिए किसी विमान को जानबूझकर तबाही का हथियार बनाने की कोशिश को हल्के में लेने की कोई गुंजाइश नहीं है। आतंकवाद अब केवल जंगलों या किसी संगठन के प्रशिक्षण शिविरों तक सीमित नहीं है। डॉक्टर, इंजीनियर और पायलट जैसे पेशेवर भी कट्टरपंथी विचारों से प्रभावित होकर हिंसा का रास्ता चुन सकते हैं। यही ‘लोन वुल्फ’ आतंकवाद की सबसे खतरनाक चुनौती है।
कल्पना करें, अगर भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार ने यह बहादुरी नहीं दिखाई होती और अल-हम्मामी अपनी योजना मे सफल हो जाता तो क्या होता! भारत देश के अनेक देश दुश्मन बन सकते थे, कांग्रेस का ‘हिन्दू आतंकवाद’ स्थापित हो सकता था, और जाने क्या-क्या! इसीलिए स्मित मच्छार की बहादुरी पर सवाल नहीं, सम्मान होना चाहिए। किसी भारतीय ने अपनी जान दांव पर लगाकर सैकड़ों लोगों को बचाया, तो उसका अभिनंदन करना न इजरायल का समर्थन है, न किसी सरकार का। यह अपने नागरिक के साहस का सम्मान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समेत कई नेताओं ने मच्छार की बहादुरी की सराहना की। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और जयराम रमेश ने भी बाद में उनके साहस को सलाम किया। इसलिए पूरी कांग्रेस को मच्छार की बहादुरी से दूरी बनाने वाला बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
लेकिन यहां एक राजनीतिक सवाल फिर भी खड़ा होता है। राहुल गांधी जैसे प्रमुख विपक्षी नेता ऐसे मामलों में अपनी बात इतनी स्पष्टता से क्यों नहीं रखते कि किसी को राजनीतिक सुविधा का सवाल उठाने का मौका ही न मिले? सरकार की आलोचना कीजिए, इजरायल की नीति की आलोचना कीजिए, फलस्तीन के नागरिकों के पक्ष में बोलिए; लोकतंत्र में इन सबकी जगह है। लेकिन आतंकवाद और उसके शिकार को लेकर भाषा में कोई भ्रम क्यों रहे?
हमारे यहां समस्या केवल आतंकवादी हमले नहीं हैं, बल्कि हमले के बाद शुरू होने वाला विमर्श भी है। 9/11 और 26/11 जैसे हमलों के बाद भी साजिश के सिद्धांतों को हवा दी गई। 26/11 के मामले में तो ‘आरएसएस की साजिश’ जैसी थ्योरी पर किताब तक सामने आई। आज भी किसी आतंकी घटना के बाद बिना पर्याप्त प्रमाण ‘फॉल्स फ्लैग’ का नैरेटिव खड़ा कर देना आसान हो गया है। सवाल पूछना गलत नहीं है, लेकिन जांच पूरी होने से पहले निष्कर्ष सुना देना समाज को भ्रमित करता है।
हमास को लेकर भारत में हुई कुछ घटनाएं भी इसी बहस को जरूरी बनाती हैं। अक्टूबर 2023 में केरल के मलप्पुरम में जमात-ए-इस्लामी से जुड़े सॉलिडैरिटी यूथ मूवमेंट की रैली में हमास के पूर्व प्रमुख खालिद मशाल ने वर्चुअल संबोधन किया था। आयोजन को लेकर विवाद हुआ और राजनीतिक दलों ने इसकी आलोचना की। यहां भी सवाल किसी समुदाय का नहीं, आतंकवादी संगठन के प्रतिनिधि को सार्वजनिक मंच देने की स्वीकार्यता का है।
यह फर्क समझना जरूरी है। किसी समुदाय के हर व्यक्ति को किसी कट्टरपंथी संगठन के विचारों से जोड़ना गलत है। उसी तरह किसी आतंकी संगठन के प्रति सहानुभूति या उसके प्रतिनिधि को मंच देने पर सवाल उठाना भी किसी समुदाय के खिलाफ होना नहीं है। उलटे, ऐसी स्पष्टता उस समुदाय के भीतर मौजूद उन आवाजों को मजबूत करती है जो आतंकवाद को साफ तौर पर गलत मानती हैं।
विपक्ष की राजनीति का मतलब सरकार के हर कदम का विरोध नहीं है। विपक्ष का मतलब है सवाल पूछना, जवाब मांगना और जरूरत पड़ने पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना। लेकिन आतंकवाद पर उसकी पहली जिम्मेदारी यह बताना है कि हिंसा किसने की, पीड़ित कौन है और उसके खिलाफ कौन खड़ा है। यहां राजनीतिक गणित की गुंजाइश जितनी कम होगी, लोकतंत्र का भरोसा उतना ही मजबूत होगा।
देश के नागरिक विपक्ष से सरकार की आलोचना जरूर चाहते हैं, लेकिन वे यह भी देखना चाहते हैं कि संकट की घड़ी में कौन देश के साथ खड़ा है। स्मित मच्छार ने अपनी जान जोखिम में डालकर यह काम कर दिखाया। राजनीति को कम से कम इतना साहस तो दिखाना ही चाहिए कि आतंकवाद को आतंकवाद कह सके और उसे रोकने वाले भारतीय के साहस को बिना किसी राजनीतिक चश्मे के सलाम कर सके। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन देश पहले है।

