– PURNENDU PUSSHPESH
भारत की आर्थिक ताकत अब केवल कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र की वृद्धि से तय नहीं होगी। आने वाले वर्षों में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि देश आधुनिक तकनीक का कितना विकास करता है और वैश्विक बाजार में उसकी कितनी हिस्सेदारी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और सेमीकंडक्टर चिप्स इसी बदलाव के केंद्र में हैं। भारत यदि इस क्षेत्र में अपनी क्षमता बढ़ाता है, तो इसका लाभ केवल तकनीकी विकास तक सीमित नहीं रहेगा। इससे विदेशी मुद्रा की बचत, नए उद्योगों का विस्तार, रोजगार सृजन और निर्यात बढ़ाने के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
आज भारत मोबाइल फोन, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और डिजिटल सेवाओं का विशाल बाजार है। इन उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली चिप्स आधुनिक अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत बन चुकी हैं। जब इनके लिए दूसरे देशों पर निर्भरता अधिक होती है, तो भारत का पैसा विदेशों में जाता है और घरेलू उद्योग को आपूर्ति संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ता है। यदि देश में अधिक चिप्स का डिजाइन, निर्माण, परीक्षण और पैकेजिंग होने लगे, तो आयात पर निर्भरता घटाने का अवसर मिलेगा। इससे विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक बचत इस बात पर निर्भर करेगी कि देश में उत्पादन की लागत, गुणवत्ता और घरेलू मांग के मुकाबले आयात कितना प्रतिस्पर्धी है।
इस क्षेत्र का सबसे बड़ा आर्थिक लाभ एक नए औद्योगिक तंत्र के विकास में है। सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए केवल चिप बनाने वाली फैक्टरी पर्याप्त नहीं होती। इसके साथ विशेष रसायन, उपकरण, सिलिकॉन वेफर, इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे, परीक्षण प्रयोगशालाएं, पैकेजिंग इकाइयां और परिवहन सेवाएं भी चाहिए। इन जरूरतों को पूरा करने के लिए अनेक सहायक उद्योग विकसित हो सकते हैं। इससे छोटे और मध्यम उद्यमों को कारोबार के नए अवसर मिलेंगे। यदि घरेलू कंपनियां इस आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनती हैं, तो तकनीक के साथ देश के भीतर पूंजी निवेश और औद्योगिक गतिविधियां भी बढ़ेंगी।
रोजगार के लिहाज से भी यह क्षेत्र महत्वपूर्ण है। चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर निर्माण, मशीन संचालन, गुणवत्ता परीक्षण और अनुसंधान के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होती है। इसके अलावा निर्माण संयंत्रों, उपकरणों के रखरखाव, परिवहन और सहायक उद्योगों में भी रोजगार पैदा हो सकता है। यह केवल नौकरियों की संख्या का सवाल नहीं है, बल्कि उच्च कौशल वाले रोजगार और नई तकनीकी विशेषज्ञता विकसित करने का अवसर भी है। भारत के युवा इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को यदि देश में ही उन्नत तकनीक पर काम करने के अवसर मिलते हैं, तो घरेलू उद्योग की क्षमता मजबूत होगी।
एआई के क्षेत्र में स्वदेशी कंप्यूटिंग क्षमता का आर्थिक महत्व और व्यापक है। भारतीय कंपनियों को यदि प्रतिस्पर्धी कीमत पर पर्याप्त कंप्यूटिंग संसाधन उपलब्ध हों, तो वे स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, बैंकिंग, भाषा तकनीक और मनोरंजन के लिए नए उत्पाद विकसित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, भारतीय भाषाओं में एआई सेवाएं, किसानों के लिए उपयोगी डिजिटल समाधान और छोटे कारोबारियों के लिए स्वचालित सॉफ्टवेयर तैयार किए जा सकते हैं। इससे घरेलू कंपनियों को नए ग्राहक मिलेंगे और वे विदेशों में भी अपनी सेवाएं बेच सकेंगी।
इसी संदर्भ में सी-डैक द्वारा विकसित किया जा रहा स्वदेशी प्रोसेसर ‘ॐ’ यानी AUM महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह 96-कोर हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग प्रोसेसर है, जिसे एआई, मशीन लर्निंग और वैज्ञानिक गणनाओं के लिए विकसित किया जा रहा है। यदि यह तकनीकी प्रदर्शन, ऊर्जा खपत, लागत और विश्वसनीयता के मामले में सफल होता है, तो भारतीय सर्वर और कंप्यूटिंग व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दे सकता है। इससे देश में विकसित एआई सेवाओं के लिए घरेलू तकनीकी आधार तैयार करने का अवसर मिलेगा। हालांकि, इसके आर्थिक लाभ का वास्तविक आकलन व्यावसायिक उपयोग, उत्पादन क्षमता और बाजार में प्रतिस्पर्धा के बाद ही किया जा सकेगा।
निर्यात भारत के लिए एक और बड़ा अवसर है। दुनिया में डिजिटल सेवाओं और एआई आधारित उत्पादों की मांग बढ़ रही है। भारत के पास सॉफ्टवेयर विकास, डिजिटल सेवाओं और रचनात्मक सामग्री के क्षेत्र में अनुभव है। यदि इस क्षमता को स्वदेशी चिप्स और कंप्यूटिंग संसाधनों का समर्थन मिलता है, तो भारतीय कंपनियां तकनीक आधारित उत्पादों और सेवाओं के वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकती हैं। इससे विदेशी मुद्रा अर्जित करने और भारत को केवल सॉफ्टवेयर सेवाओं तक सीमित न रखकर हार्डवेयर तथा तकनीकी उत्पादों के क्षेत्र में भी आगे ले जाने का अवसर मिलेगा।
लेकिन आर्थिक लाभ अपने आप नहीं मिलेंगे। सेमीकंडक्टर उद्योग में भारी पूंजी निवेश, उन्नत मशीनों, स्थिर बिजली आपूर्ति, कुशल कर्मचारियों और लंबे शोध की जरूरत होती है। इसलिए सरकारी सहायता के साथ निजी निवेश, पारदर्शी नीतियां, प्रशिक्षित मानव संसाधन और उद्योगों के बीच सहयोग भी जरूरी है। केवल फैक्टरी स्थापित करना सफलता नहीं है; उसका प्रतिस्पर्धी लागत पर लगातार गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करना अधिक महत्वपूर्ण है।
भारत को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने का लाभ दो स्तरों पर मिल सकता है। पहला, देश की घरेलू जरूरतों के लिए भरोसेमंद तकनीक उपलब्ध होगी और आपूर्ति बाधित होने का जोखिम घटेगा। दूसरा, भारत वैश्विक बाजार में अपने उत्पाद बेचकर नए आर्थिक अवसर पैदा कर सकेगा। स्वदेशी चिप निर्माण का असली उद्देश्य यही होना चाहिए कि देश तकनीक का बड़ा उपभोक्ता बने रहने के बजाय उसके विकास, उत्पादन और निर्यात में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता को ठोस आधार मिल सकता है।

