– Purnendu Pusshpesh
आज के बच्चे मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में बड़े हो रहे हैं। पढ़ाई करनी हो, किसी सवाल का जवाब खोजना हो या अपनी पसंद के विषय के बारे में जानना हो, इंटरनेट उनके लिए एक बड़ा साधन बन चुका है। लेकिन इसी दुनिया में ऐसे खतरे भी हैं, जिनसे बच्चों को बचाना जरूरी है। सवाल यह नहीं है कि बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने दिया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि उन्हें सुरक्षित तरीके से इसका इस्तेमाल करना कैसे सिखाया जाए।
इंटरनेट बच्चों के लिए ज्ञान और सीखने के नए रास्ते खोलता है। वे घर बैठे दुनिया भर की जानकारी हासिल कर सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर, अश्लील और हिंसक सामग्री, ऑनलाइन ठगी, साइबर बुलिंग, यौन शोषण और एआई की मदद से बनाई गई फर्जी तस्वीरें उनके लिए गंभीर खतरा बन रही हैं। कई बार अनजान लोग बच्चों से दोस्ती कर उनका भरोसा जीतते हैं और बाद में उन्हें ब्लैकमेल करने लगते हैं। सोशल मीडिया पर होने वाली बदसलूकी का असर भी बच्चों के आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
एक और समस्या मोबाइल की लत है। लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, वीडियो अपने आप चलने की सुविधा और अंतहीन स्क्रॉल बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखते हैं। ऐसे में उनकी पढ़ाई, नींद और दूसरी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। बच्चों से यह उम्मीद करना कि वे इन खतरों को खुद समझकर हर बार सही फैसला लेंगे, व्यावहारिक नहीं है। इसके लिए परिवार, स्कूल, सरकार और तकनीकी कंपनियों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
ग्रामीण भारत में स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच इस चर्चा को और महत्वपूर्ण बनाती है। असर 2024 के सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण परिवारों में स्मार्टफोन की उपलब्धता 2018 के 36 प्रतिशत से बढ़कर 2022 में 74 प्रतिशत और 2024 में 84 प्रतिशत हो गई। इसी सर्वेक्षण में 14 से 16 वर्ष के 82 प्रतिशत किशोर स्मार्टफोन का इस्तेमाल करना जानते थे। लेकिन इंटरनेट सुरक्षा से जुड़े सवालों में करीब आधे किशोर प्रोफाइल की निजता, संदिग्ध प्रोफाइल की शिकायत और पासवर्ड बदलने जैसी बातों से अनजान पाए गए। इससे साफ है कि मोबाइल चलाना सीख लेना और उसका सुरक्षित इस्तेमाल करना दो अलग-अलग बातें हैं।
बच्चों की सुरक्षा के नाम पर इंटरनेट या सोशल मीडिया पर पूरी तरह रोक लगा देना भी सही रास्ता नहीं है। इससे उनकी सीखने की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं। खासकर उन बच्चों के लिए इंटरनेट बहुत उपयोगी है, जिनके आसपास अच्छी लाइब्रेरी, शिक्षण सामग्री या दूसरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। जरूरत इस बात की है कि सुरक्षा और अवसर के बीच संतुलन बनाया जाए।
इसके लिए सबसे पहले स्कूलों में डिजिटल सुरक्षा की पढ़ाई जरूरी है। बच्चों को बताया जाए कि अनजान लोगों से ऑनलाइन दोस्ती करते समय सावधानी क्यों जरूरी है, अपनी तस्वीरें और निजी जानकारी किससे साझा नहीं करनी चाहिए और साइबर बुलिंग या ब्लैकमेल होने पर मदद कहां से लेनी है। माता-पिता और शिक्षकों को भी प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि वे बच्चों पर केवल निगरानी रखने के बजाय उनकी समस्याओं को समझ सकें।
तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। बच्चों के लिए सुरक्षित सेटिंग डिफॉल्ट रूप से लागू होनी चाहिए। हानिकारक सामग्री की शिकायत पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए और बच्चों की निजी जानकारी का इस्तेमाल विज्ञापन या उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। एआई से बनाई गई फर्जी तस्वीरों और बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है। उम्र की पुष्टि करने की व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए, जिससे बच्चों की निजता को नुकसान न पहुंचे।
सरकार को ऐसे नियम बनाने चाहिए, जो बच्चों को सुरक्षा दें और उनकी शिक्षा तथा अभिव्यक्ति के अवसर भी बनाए रखें। केवल प्रतिबंध लगा देने से समस्या खत्म नहीं होगी। असली जरूरत बच्चों को समझदार बनाना और इंटरनेट कंपनियों को जवाबदेह ठहराना है।
बच्चे देश का भविष्य हैं। उन्हें डिजिटल दुनिया से दूर रखने के बजाय इस दुनिया में सुरक्षित चलना सिखाना होगा। इंटरनेट उनके लिए ज्ञान का दरवाजा बने, परेशानी का कारण नहीं। इसके लिए बच्चों को जागरूक करना, अभिभावकों को सक्षम बनाना और कंपनियों से जिम्मेदारी निभवाना जरूरी है। बच्चों की सुरक्षा और उनके सीखने के अधिकार में टकराव नहीं, बल्कि दोनों के बीच सही संतुलन ही हमारी असली जिम्मेदारी है।

