– PURNENDU PUSSHPESH
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें हर व्यक्ति को अपनी बात कहने, सरकार की नीतियों का विरोध करने और व्यवस्था से सवाल पूछने का अधिकार मिलता है। लेकिन इस अधिकार का अर्थ यह नहीं है कि भीड़ जो चाहे, वही फैसला करे। लोकतंत्र और भीड़तंत्र के बीच यही बुनियादी अंतर है। लोकतंत्र संवाद, सहमति और असहमति के सम्मान से चलता है, जबकि भीड़तंत्र दबाव, उन्माद और ताकत के प्रदर्शन से। जब सड़क पर जुटी भीड़ कानून और संस्थाओं से ऊपर खुद को मानने लगती है, तब जनआंदोलन का स्वरूप अराजकता में बदल जाता है।
किसी सरकार की नीति गलत हो सकती है। उसके फैसलों से जनता का बड़ा वर्ग असहमत हो सकता है। ऐसे में विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, धरना और आंदोलन लोकतांत्रिक व्यवस्था के जरूरी हिस्से हैं। कई बार जनदबाव के कारण सरकारों को अपने फैसले बदलने भी पड़ते हैं। लेकिन विरोध के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति जलाना, रास्ते बंद करना, सरकारी कामकाज ठप करना और लोगों को डराकर अपनी मांगें मनवाना लोकतांत्रिक अधिकार नहीं हो सकता। इससे असहमति का उद्देश्य पीछे छूट जाता है और दबाव की राजनीति हावी होने लगती है।
दुनिया के कई देशों में हाल के वर्षों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं। श्रीलंका में 2022 का अरगलाया आंदोलन, बांग्लादेश में 2024 का आरक्षण विरोधी आंदोलन और नेपाल में बार-बार होने वाली नाकेबंदी ने दिखाया कि जनअसंतोष जब संस्थागत व्यवस्था को चुनौती देने लगता है, तो उसका असर केवल सरकार तक सीमित नहीं रहता। संसद, न्यायपालिका और प्रशासन जैसी संस्थाओं की स्थिरता भी प्रभावित होती है। यूरोप के फ्रांस, इटली और बेल्जियम जैसे देशों में भी नीतियों के विरोध में शुरू हुए प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं हुई हैं। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक और राजनीतिक असंतोष किसी भी देश में भीड़ की अराजकता का रूप ले सकता है।
भारत में भी आंदोलनों के दौरान यह सवाल बार-बार उठता है कि विरोध की सीमा कहां तक होनी चाहिए। किसी नीति के खिलाफ आवाज उठाना और निर्वाचित सरकार को हिंसक दबाव से हटाने की कोशिश करना दो अलग बातें हैं। सत्ता परिवर्तन का रास्ता चुनाव है, न कि सड़क पर शक्ति प्रदर्शन। सरकार से असहमति रखने वाले लोगों को भी यह समझना होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में फैसले बदलवाने के संवैधानिक रास्ते मौजूद हैं। उनका इस्तेमाल किए बिना सीधे व्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिश अंततः लोकतंत्र को ही कमजोर करती है।
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का एक बड़ा आधार यह है कि यहां नियमित चुनाव होते हैं, राज्यों को राजनीतिक अभिव्यक्ति के पर्याप्त अवसर मिलते हैं और न्यायपालिका संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करती है। सेना की गैर-राजनीतिक भूमिका भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। इन संस्थाओं के कारण असंतोष को व्यवस्था के भीतर व्यक्त करने के रास्ते बने रहते हैं। लेकिन इन संस्थाओं की मजबूती अपने आप सुनिश्चित नहीं होती। सरकार, राजनीतिक दलों और नागरिकों ….सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है।
सरकारों को भी यह समझना होगा कि हर विरोध को विरोधी राजनीति या व्यवस्था के खिलाफ साजिश बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। समय पर संवाद न होने, जनसुनवाई की अनदेखी और फैसलों में पारदर्शिता की कमी से असंतोष बढ़ता है। विधेयकों और बड़ी नीतियों पर जनता तथा संबंधित पक्षों से पहले ही राय लेना जरूरी है। दूसरी ओर, पुलिस की भूमिका निष्पक्ष होनी चाहिए। भीड़ नियंत्रण के नाम पर अनावश्यक बल प्रयोग भी उतना ही गलत है, जितना आंदोलन की आड़ में हिंसा। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और सोशल मीडिया पर हिंसा भड़काने वाले दुष्प्रचार पर भी प्रभावी नियंत्रण जरूरी है।
लोकतंत्र केवल अधिकार मांगने की व्यवस्था नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों को निभाने की भी व्यवस्था है। सरकार को असहमति सुननी होगी और नागरिकों को विरोध की मर्यादा बनाए रखनी होगी। भीड़ का आकार किसी मांग को अपने आप सही नहीं बना देता। सही और गलत का फैसला कानून, तथ्यों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर होना चाहिए। जिस दिन भीड़ का दबाव संस्थाओं के फैसलों से बड़ा हो जाएगा, उस दिन लोकतंत्र का आधार कमजोर पड़ने लगेगा। इसलिए यह समझना जरूरी है कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, लेकिन भीड़ का उन्माद नहीं।

