कांग्रेस को अब नेतृत्व परिवर्तन का साहस दिखाना चाहिए

– Purnendu Pusshpesh

किसी राजनीतिक दल के लिए चुनावी हार से उबरना असंभव नहीं, लेकिन लगातार मिल रही नाकामियों के बावजूद अपनी कार्यशैली बदलने से इनकार करना जरूर चिंता का विषय है। कांग्रेस आज इसी दुविधा में फंसी दिखाई देती है। चार राज्यों की विधान परिषद की 28 सीटों के चुनाव में उसके 12 उम्मीदवारों में से केवल एक को जीत मिली। महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक सीट पर मिली सफलता के बावजूद पार्टी का समग्र प्रदर्शन निराशाजनक रहा। कर्नाटक में, जहां कांग्रेस की अपनी सरकार है, चारों सीटों पर हार ने संगठन की क्षमता और नेतृत्व की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े किए हैं।

इन चुनावों को पूरे देश में कांग्रेस की लोकप्रियता का निर्णायक पैमाना मानना उचित नहीं होगा। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग सीमित होता है और यहां उम्मीदवार की व्यक्तिगत साख, स्थानीय संपर्क तथा संगठन की सक्रियता की विशेष भूमिका रहती है। लेकिन यही कारण इन नतीजों को अधिक गंभीरता से देखने की मांग भी करता है। जब पार्टी अपने शासन वाले राज्य में भी इन मतदाताओं का पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा पाती, तो उसे अपनी कमजोरियों की तलाश बाहर करने के बजाय अपने भीतर करनी चाहिए।

कांग्रेस की समस्या केवल चुनाव हारने तक सीमित नहीं है। असली संकट यह है कि पार्टी अपनी राजनीतिक दिशा, संगठनात्मक क्षमता और जनसंपर्क को लेकर कितनी गंभीरता से आत्ममंथन करती है। विपक्ष का काम सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना है, लेकिन केवल विरोध की राजनीति किसी दल को सत्ता का विकल्प नहीं बना सकती। जनता को यह भी दिखना चाहिए कि विपक्ष के पास रोजगार, शिक्षा, कृषि, महंगाई और आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर क्या ठोस योजना है। कांग्रेस यदि अपनी आलोचनाओं को विश्वसनीय विकल्प में नहीं बदलती, तो उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता सीमित होती जाएगी।

चुनाव प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायत हो तो उसे प्रमाणों के आधार पर संबंधित संस्थाओं के सामने उठाना चाहिए। लेकिन हर हार के बाद चुनाव आयोग या मतदान प्रणाली पर सवाल खड़े करने से पार्टी की अपनी चुनावी कमियां दूर नहीं होंगी। लोकतंत्र में आरोप लगाने से अधिक महत्वपूर्ण है आरोपों को साबित करना और अपनी असफलताओं के कारणों को स्वीकार करना। कांग्रेस को यह तय करना होगा कि उसकी ऊर्जा चुनावी व्यवस्था पर लगातार संदेह जताने में खर्च होगी या संगठन को मजबूत करने और मतदाताओं का विश्वास जीतने में लगेगी।

इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नेतृत्व है। कांग्रेस को यह मानने में संकोच नहीं करना चाहिए कि लंबे समय से चली आ रही नेतृत्व व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है। किसी नेता का राजनीतिक अनुभव अपने आप में पर्याप्त योग्यता नहीं होता; उसकी प्रासंगिकता इस बात से तय होती है कि वह संगठन को कितना विस्तार देता है, नए नेतृत्व को कितना अवसर देता है और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप कितनी प्रभावी रणनीति बना पाता है। यदि मौजूदा व्यवस्था अपेक्षित परिणाम नहीं दे रही, तो उसमें बदलाव पर विचार करना कमजोरी नहीं, बल्कि राजनीतिक विवेक है।

नेतृत्व परिवर्तन का अर्थ केवल किसी एक चेहरे को हटाकर दूसरे को बैठा देना नहीं होना चाहिए। कांग्रेस को ऐसा नेतृत्व चाहिए जो निर्णय लेने में सक्षम हो, राज्यों के नेताओं पर भरोसा करे और कार्यकर्ताओं को संगठन में आगे बढ़ने का वास्तविक अवसर दे। पार्टी के भीतर संवाद और जवाबदेही मजबूत होनी चाहिए। वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का उपयोग करते हुए नई पीढ़ी को जिम्मेदारी देना जरूरी है, ताकि संगठन अतीत की उपलब्धियों के सहारे नहीं, भविष्य की संभावनाओं के आधार पर आगे बढ़े।

कांग्रेस के सामने अब विकल्प स्पष्ट है। वह अपनी विफलताओं के लिए बाहरी कारण तलाशती रहे या अपनी राजनीति और नेतृत्व में बदलाव की पहल करे। यदि पार्टी सचमुच वापसी चाहती है, तो उसे नेतृत्व परिवर्तन का साहस दिखाकर अपनी किस्मत नए सिरे से आजमानी चाहिए। नया नेतृत्व जीत की गारंटी नहीं दे सकता, लेकिन ठहराव तोड़ने, संगठन में नई ऊर्जा भरने और मतदाताओं के सामने विश्वसनीय विकल्प पेश करने का अवसर जरूर दे सकता है। कांग्रेस को समझना होगा कि राजनीतिक विरासत सम्मान दिला सकती है, लेकिन भविष्य की सफलता के लिए नई सोच, स्पष्ट नीति और जवाबदेह नेतृत्व अनिवार्य हैं।