चास का चुनावी रण: अतिप्रचार बनाम ज़मीनी सियासत, भोलू पासवान क्यों आगे दिखते हैं

– पूर्णेन्दु पुष्पेश चास नगर निगम का चुनाव इस बार महज़ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, पुराने जनसंपर्क और नए राजनीतिक प्रयोगों की…

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दोबारा भरोसा या नई शुरुआत? चास की जनता के सामने विकल्प

— पूर्णेन्दु ‘पुष्पेश’ चास नगर निगम चुनाव इस बार सत्ता लोलुपता की सीमाएँ पार कर रहा है। 30 से ज्यादा नए-पुराने घड़े अपनी चमक दिखाने…

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डिजिटल मीडिया एथिक्स 2021 : अनुशासन से ही बचेगी डिजिटल पत्रकारिता की साख

– पूर्णेन्दु पुष्पेश.  किसी भी समाज, संस्था या देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए केवल आज़ादी ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उस आज़ादी…

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वेब पत्रकारिता: निबंधित वेब पत्रकार और जनता का भरोसा

– पूर्णेन्दु पुष्पेश वेब न्यूज़ मीडिया आज सिर्फ़ सूचना का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह एक जीवंत डिजिटल आंदोलन बन चुका है। इस आंदोलन ने…

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क्यों अमेरिका भारत से भयभीत है?

– पूर्णेन्दु ‘पुष्पेश ‘ विश्व राजनीति के इतिहास में अमेरिका लंबे समय तक एकमात्र शक्ति केंद्र माना जाता रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद…

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‘अतीत से सीखो, वर्तमान को जियो’-अतीत की भूलों से सबक लेकर बनेगा सशक्त भारत

– पूर्णेन्दु सिन्हा ‘पुष्पेश ‘ (स्वतंत्रता दिवस विशेष )  आज़ाद भारत की कहानी जितनी प्रेरक है, उतनी ही पेचीदा भी। जब 15 अगस्त 1947 को…

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आपातकाल: अतीत की छाया और वर्तमान की चेतावनी

Article by Purnendu Sinha Pushpesh भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 26 जून 1975 एक ऐसा दिन है जिसे अनदेखा करना भूल होगी और भुला देना…

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झारखंड में पत्रकारों की पेंशन योजना: वादों से आगे कब बढ़ेगी सरकार?

– पूर्णेन्दु सिन्हा ‘पुष्पेश ‘ बिहार सरकार द्वारा हाल ही में पत्रकारों की पेंशन राशि को ₹6,000 से बढ़ाकर ₹15,000 किए जाने और उनके निधन…

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झारखंड के सरकारी अस्पतालों से क्यों कतराते हैं युवा डॉक्टर?

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु सिन्हा ‘पुष्पेश ‘  झारखंड जैसे राज्य के लिए यह विडंबना ही कही जाएगी कि जहां एक ओर ग्रामीण और आदिवासी बहुल क्षेत्रों…

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तीन दशक की चुप्पी : संस्कार और संवाद की खोज में बोकारो

सदियों पुरानी नीति रही है — किसी देश या प्रदेश को यदि कमज़ोर करना हो, तो सबसे पहले उसकी संस्कृति पर प्रहार करो। उसकी कला,…

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