प्रस्तुत है राधा जी की विरह वेदना पर मेरी ये रचना :——.
बड़ा हीं छलिया हो ब्रजनाथ , नाथ क्यूँ छोड़ गए मोर हाथ । आवन कहि गए अजहु न आए , एक पल मोरा एक जुग जाए , कर दियो मोहे अनाथ । नाथ क्यूँ छोड़ गए मोर हाथ । बड़ा हीं छलिया हो………… मैं बिरहन हूँ बिरह कि मारी , बाट निहारत रैना सारी , कब आओगे नाथ । नाथ क्यूँ छोड़ गए मोर हाथ । बड़ा हीं छलिया हो………… काहे को तोसे प्रीत लगाई , अब तो बैठि रहो पछताई , अब तो आओ नाथ । नाथ क्यूँ छोड़ गए मोर हाथ । बड़ा हीं छलिया हो…………