ब्रह्मेश्वर के दोहे—–
जबसे प्रभु में नेह लगी, छूटे माया मोह ।
काया निर्मल हो गई, रहा न क्रोध न द्रोह ।।
नहिं मोहे चाह प्रशंसा की, नहीं सराहन भाय ।
मद के वश में हो कहीं, राम न देहुँ भुलाय ।।
कलियुग की यह रीति है, स्वारथ लागि मिताइ ।
काम सधत मुँह फेर ले, फिर नहिं पूछत भाइ ।।
‘ब्रह्मेश्वर’ की विनय सुनहु, हे कृपालु रघुबीर ।
बसहु सदा मम हृदय भवन, हरहु मोर भव पीर ।।
रचनाकार :
ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र