अब राखो शरन कृपालु हरी…………ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

प्रस्तुत है शरणागत भजन के रूप में मेरी ये रचना :—–

अब राखो शरन कृपालु हरी ।
मैं कामी क्रोधी और लोभी ,
कपटि कुटिल विषयी और भोगी ,
पाप करत दिन जायो हरी ।
अब राखो शरन……………

ममता मोह में प्रभु को भुलायो ,
संत मिलन मोहे कबहुँ न भायो ,
भजन कियो नहिं आधो घरी ।
अब राखो शरन……………

बड़े भाग्य मानुष तन पाया ,
जनम अकारथ यूँ हिं गँवाया ,
केहि विधि अब भवसिन्धु तरी ।
अब राखो शरन……………

भटकत बीती सारि उमरिया ,
अब प्रभु लो ना मोरि खबरिया ,
आयो अब प्रभु शरन तेरी ।
अब राखो शरन……………

 

रचनाकार

 
   ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र