प्रभु जी तुम भक्तन्ह के हितकारी …………ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र

प्रभु के भक्त जब भी मोह के वश हुए हैं प्रभु ने उनकी रक्षा अवश्य की है। इसी प्रसंग पर प्रस्तुत है मेरी ये रचना :—-

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प्रभु जी तुम भक्तन्ह के हितकारी ।
मोह के बस जब भए नारद ,
प्रभु आपन बिरद सम्हारी ।
बन्दर रूप देइ कर प्रभु ने ,
नारद जी को उबारी ।
प्रभु जी तुम भक्तन्ह के………
मोह ग्रसित जब भई सती ,
तब मन में संशय बाढ़ी ।
धरि सीता के रूप सती ने ,
लिन्हि परिक्षा भारी ।
प्रभु जी तुम भक्तन्ह के………
मातु अकेल चली आई हो ,
कहाँ गए त्रिपुरारी ।
सुनत प्रभू के बचन सती की ,
मिट गई शंका भारी ।
प्रभु जी तुम भक्तन्ह के………
मोह के बस जब भए गरूड़ ,
तब मन में छाइ अँधियारी ।
जब हरि कथा सुनी गरूड़ ने ,
मिट गइ संशय सारी ।
प्रभु जी तुम भक्तन्ह के………
मोह ग्रसित जब भए भुषुंडी ,
प्रभु ने रूप बिस्तारी ।
त्राहि त्राहि कर गिरे चरन में ,
मैं प्रभु शरन तिहारी ।
प्रभु जी तुम भक्तन्ह के……..….

 

रचनाकार


   ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र