– Purnendu Pusshpesh
हमारे समय की एक अजीब आदत हो गई है। हम हर चीज का हिसाब लगाने लगे हैं। किससे कितना फायदा हुआ, किसने कितना दिया, किसने कितना लिया। शायद इसी आदत का असर अब उन चीजों पर भी पड़ रहा है, जिन्हें हिसाब से नहीं, भाव से समझा जाता है। “जहां भाव चाहिए, वहां हम भाव लगाने बैठे हैं” -यह बात ईश्वरभक्ति और राष्ट्रभक्ति, दोनों पर बड़ी सहजता से लागू होती है।
ईश्वर को मानने वाला पूजा करता है, मंदिर जाता है, प्रार्थना करता है। यह आस्था है और इसकी अपनी जगह है। लेकिन भक्ति की बात आते ही हम कई बार बाहरी चीजों में उलझ जाते हैं। पूजा कितनी बड़ी हुई, आयोजन कितना भव्य था, कौन कितना धार्मिक दिख रहा है—इन सवालों में असली बात कहीं पीछे छूट जाती है। आखिर ईश्वर से हमारा रिश्ता दिखाने की चीज तो है नहीं। वह भीतर का मामला है।
मुझे लगता है, भक्ति का सबसे सरल अर्थ यही है कि आदमी अपने भीतर यह महसूस करे कि उससे ऊपर भी कुछ है और इसलिए उसे अपनी मनमानी की भी एक सीमा समझनी चाहिए। पूजा के बाद अगर हम पहले जैसे ही रहें तो पूजा अपनी जगह है, जीवन अपनी जगह। लेकिन अगर वही श्रद्धा हमें थोड़ा संयमी, थोड़ा ईमानदार और दूसरे के दुख के प्रति थोड़ा संवेदनशील बनाती है, तो शायद उसका असर ज्यादा गहरा है।
राष्ट्रभक्ति की बात करें तो मामला और दिलचस्प हो जाता है। भारत से प्रेम करने के लिए हमारे पास बहुत कुछ है। यह देश केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, हजारों वर्षों से चली आ रही एक सभ्यता है। हमारी भाषाएं, परंपराएं, परिवार, पर्व, तीर्थ, इतिहास और उन सबके बीच बनी साझा स्मृति भारत को भारत बनाती है। तिरंगा देखकर मन में गर्व होना इसलिए स्वाभाविक है। सीमा पर खड़े सैनिक के प्रति सम्मान इसलिए स्वाभाविक है।
लेकिन राष्ट्रभक्ति केवल उन क्षणों में नहीं होती जब राष्ट्रगान बज रहा हो या हाथ में तिरंगा हो। वह उस समय भी होती है जब कोई देख नहीं रहा होता। सड़क पर कचरा न फेंकना, सार्वजनिक संपत्ति को अपना समझना, अपने काम में ईमानदारी रखना, कानून को केवल दूसरों के लिए न मानना; ये बातें सुनने में छोटी लगती हैं, लेकिन देश इन्हीं छोटी-छोटी आदतों से बनता है। हम अक्सर पूछते हैं कि देश हमारे लिए क्या कर रहा है। कभी-कभी यह भी सोचना चाहिए कि हम देश के लिए क्या कर रहे हैं। इसमें कोई बड़ी-बड़ी चीज करने की जरूरत नहीं। डॉक्टर अपना काम ईमानदारी से करे, शिक्षक बच्चों को ठीक से पढ़ाए, व्यापारी सही तौल दे, अधिकारी बिना लेन-देन के काम करे, पत्रकार खबर को खबर की तरह रखे और नागरिक अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाए—देशभक्ति शायद इससे ज्यादा सहज रूप में कहीं नहीं दिखती।
और हां, देश से प्रेम करने का मतलब यह भी नहीं कि देश की हर कमी पर चुप रहा जाए। जिस घर से प्रेम होता है, उसकी टूटी खिड़की भी दिखाई देती है। उसे ठीक करने की इच्छा ही तो प्रेम है। इसलिए व्यवस्था की कमी पर सवाल उठाना या सुधार की मांग करना राष्ट्रविरोध नहीं हो सकता। फर्क केवल इतना है कि सवाल देश को नीचा दिखाने के लिए उठ रहा है या देश को बेहतर देखने की इच्छा से।
शायद परेशानी वहां शुरू होती है, जहां हम भक्ति और राष्ट्रभक्ति दोनों का प्रमाणपत्र बांटने लगते हैं। कौन ज्यादा धार्मिक है, कौन ज्यादा राष्ट्रवादी है, किसने कितना कहा—इसका हिसाब रखने लगते हैं। जबकि सच्चा भाव शायद उतना ही शांत होता है जितना गहरा।
ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भारत के प्रति प्रेम, दोनों को प्रदर्शन से ज्यादा जीवन में जगह चाहिए। पूजा के बाद हमारा व्यवहार और देश का नाम लेते समय हमारा आचरण—यही असली कसौटी है।
इसलिए बात फिर वहीं लौटती है… जहां भाव चाहिए, वहां भाव लगाने की जरूरत नहीं है। वहां भाव रखने की जरूरत है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा मन में रहे और भारत के प्रति गर्व भी। बस इतना ध्यान रहे कि दोनों भाव हमारे व्यवहार को थोड़ा बेहतर बनाते रहें। आखिर भाव वही अच्छा है, जिसे बार-बार बताना न पड़े; वह अपने आप दिखाई देता है। राष्ट्रभक्ति जितनी मुखर हमारे शब्दों में हो, उतनी ही दृढ़ हमारे आचरण में भी हो। क्योंकि अंततः देश को हमारे नारों से ज्यादा हमारे चरित्र, अनुशासन और कर्तव्यबोध की जरूरत है।

