पुलिस को मजबूत किए बिना मजबूत भारत की कल्पना अधूरी

– editorial by Purnendu Pusshpesh

भारत को विकसित और सुरक्षित राष्ट्र बनाना है तो पुलिस को केवल कानून लागू करने वाली ताकत के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। पुलिस उस व्यवस्था की सबसे पहली कड़ी है, जहां आम नागरिक का सामना सीधे राज्य से होता है। इसलिए पुलिस जितनी सक्षम, निष्पक्ष और संसाधनयुक्त होगी, कानून का भरोसा भी उतना ही मजबूत होगा।

आज सबसे बड़ी चिंता पुलिस बल की संख्या को लेकर है। दिए गए आंकड़ों के अनुसार देश में करीब 5.92 लाख पुलिस पद खाली हैं। और ध्यान देने वाली बात यह है कि ये रिक्तियां उन स्वीकृत पदों के आधार पर हैं, जिनका निर्धारण कई राज्यों में वर्षों पहले हुआ था। तब आबादी कम थी, शहर छोटे थे और अपराध का स्वरूप भी आज जैसा नहीं था। संभवतः यह अनुमानित संख्या दोगुनी से ऊपर हो गई हो ; क्योंकि , आज साइबर अपराध है, संगठित अपराध है, महिला और बाल अपराध की नई चुनौतियां हैं, यातायात का दबाव है और हर घटना के साथ सोशल मीडिया की निगरानी और प्रतिक्रिया का नया दबाव भी जुड़ गया है। ऐसे में केवल पुरानी संख्या के आधार पर पुलिस बल चलाना व्यावहारिक नहीं है।

दूसरी बड़ी समस्या पुलिसकर्मियों के काम के घंटे हैं। कॉमन कॉज और सीएसडीएस के अध्ययन में पुलिसकर्मियों के औसत कामकाज का समय करीब 14 घंटे प्रतिदिन पाया गया था। यह स्थिति किसी भी सामान्य कर्मचारी के लिए कठिन है। पुलिसकर्मी भी इंसान है। उसका भी परिवार है, उसे भी आराम चाहिए और उसके शरीर तथा दिमाग को भी लगातार तनाव के बाद विश्राम की जरूरत होती है। थका हुआ पुलिसकर्मी आखिर कितने समय तक पूरी एकाग्रता के साथ कानून-व्यवस्था संभाल पाएगा?

इसलिए पुलिस में पर्याप्त भर्ती केवल रोजगार का सवाल नहीं है। यह सीधे नागरिक सुरक्षा का सवाल है। दो या तीन शिफ्ट की व्यवस्था, साप्ताहिक अवकाश, बेहतर आवास, स्वास्थ्य सुविधा, आधुनिक प्रशिक्षण और पर्याप्त वाहन व तकनीकी उपकरण पुलिस सुधार के बुनियादी हिस्से होने चाहिए। जिस जवान से चौबीस घंटे उपलब्ध रहने की अपेक्षा की जाती है, उसके रहने और आराम की व्यवस्था भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

पुलिस के संवैधानिक अधिकारों की बात भी इसी संदर्भ में जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस को जवाबदेही से बाहर कर दिया जाए। पुलिस पर कानून, न्यायपालिका, वरिष्ठ अधिकारियों और निर्धारित संस्थागत निगरानी का नियंत्रण होना ही चाहिए। लेकिन जवाबदेही और रोजमर्रा के काम में अनावश्यक हस्तक्षेप दो अलग बातें हैं। अपराध की जांच किस दिशा में होगी, किस व्यक्ति पर कार्रवाई होगी या किस मामले में कानून कैसे लागू होगा, इन फैसलों में पेशेवर पुलिसिंग की जगह राजनीतिक या बाहरी दबाव नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में पुलिस सुधार के लिए जो निर्देश दिए थे, उनमें राजनीतिक प्रभाव से संस्थागत सुरक्षा, अधिकारियों के कार्यकाल में स्थिरता, जांच को बेहतर बनाने और पुलिस शिकायत व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल थे। अदालत को बाद के वर्षों में भी इन निर्देशों के पालन की स्थिति पर विचार करना पड़ा है। इसका मतलब साफ है कि सुधार की जरूरत आज भी खत्म नहीं हुई है।

केंद्र और राज्य सरकारों से अब अपेक्षा है कि पुलिस सुधार को केवल बैठकों और समितियों तक सीमित न रखा जाए। समयबद्ध तरीके से रिक्तियां भरी जाएं, नए सिरे से पुलिस बल की जरूरत का वैज्ञानिक आकलन हो और आवश्यकता के अनुसार स्वीकृत पद बढ़ाए जाएं। केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर ऐसा व्यापक कानून या साझा ढांचा तैयार करने पर भी विचार कर सकती है, जिसमें पुलिस की जवाबदेही और उसकी कार्यगत स्वतंत्रता दोनों का संतुलन स्पष्ट हो।

पुलिस से गलती होती है तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन सही काम करने वाले पुलिसकर्मी को केवल इसलिए असुरक्षित नहीं महसूस होना चाहिए कि उसके निर्णय से किसी प्रभावशाली व्यक्ति की नाराजगी हो सकती है। पुलिस को कानून के प्रति जवाबदेह रहना है, किसी व्यक्ति या समूह के प्रति नहीं।

भारत की पुलिस को जनता के करीब, तकनीक से लैस, पर्याप्त संख्या में और मानवीय परिस्थितियों में काम करने वाली पुलिस बनाना अब समय की जरूरत है। पुलिस को मजबूत करना किसी सरकार पर एहसान नहीं, बल्कि संविधान और नागरिकों के प्रति शासन की जिम्मेदारी है। मजबूत पुलिस का मतलब कठोर पुलिस नहीं, बल्कि ऐसी पुलिस है जो कानून के अनुसार काम करे, नागरिक के अधिकारों का सम्मान करे और खुद भी अपने अधिकारों के साथ सुरक्षित होकर काम कर सके। यही पुलिस सुधार का असली रास्ता है और विकसित भारत की मजबूत कानून-व्यवस्था की बुनियाद भी।