असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन सम्मान उसकी मर्यादा

– पूर्णेन्दु पुष्पेश  

लोकतंत्र की ताकत इस बात में है कि सरकार से सवाल पूछे जा सकते हैं और असहमति खुलकर दर्ज की जा सकती है। लेकिन असहमति की भी अपनी कसौटी है—उसमें तथ्य हों, तर्क हो और कोई बेहतर विकल्प हो। केवल विरोध करते रहना विपक्ष को मजबूत नहीं बनाता। जनता आखिर यह भी जानना चाहती है कि सरकार के बाद रास्ता क्या है।

इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम इसी बहस का एक उदाहरण बन गया। कार्यक्रम में शिक्षा, पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था, रोजगार और फीस जैसे छात्रों से जुड़े मुद्दे उठाए गए। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री वाला प्रसंग पूरे विवाद पर हावी हो गया। भाजपा ने इसकी आलोचना की, जबकि कांग्रेस ने इसे राजनीतिक व्यंग्य और अभिव्यक्ति का हिस्सा बताया। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी माना कि इस प्रसंग से छात्रों के मूल मुद्दे पीछे चले गए।

सवाल मिमिक्री के पक्ष या विपक्ष से ज्यादा राजनीति की प्राथमिकता का है। छात्र जब किसी राजनीतिक मंच पर आते हैं तो वे तालियों के साथ अपने भविष्य के सवालों के जवाब भी तलाशते हैं। उन्हें रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, उच्च शिक्षा की लागत और कौशल के अवसरों पर स्पष्ट बात चाहिए। ऐसे मंच पर मनोरंजन हो सकता है, लेकिन मुद्दा मनोरंजन नहीं बन जाना चाहिए।

यहीं विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार से सवाल करना उसका अधिकार और जिम्मेदारी दोनों है। लेकिन प्रभावी विपक्ष वह है जो सरकार की नीति की कमियां आंकड़ों के साथ सामने रखे और उसके बदले अपनी नीति बताए। शिक्षा व्यवस्था पर आपत्ति है तो सुधार का मॉडल क्या है? रोजगार की चिंता है तो रोजगार पैदा करने की योजना क्या है? भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी है तो भरोसेमंद व्यवस्था कैसे बनेगी? जनता को केवल यह सुनते रहने में रुचि नहीं हो सकती कि सरकार गलत है; वह यह भी जानना चाहेगी कि विपक्ष सही क्या करेगा।

विपक्ष को शायद अपनी बैठकों में एक नया एजेंडा जोड़ लेना चाहिए—‘सरकार का विरोध करने के बाद आगे क्या?’ और उसके बाद दूसरा सवाल—‘हम सत्ता में आए तो पहले सौ दिन में करेंगे क्या?’ यह व्यंग्य किसी व्यक्ति पर नहीं, उस राजनीतिक शैली पर है जिसमें कभी-कभी एक मंचीय प्रस्तुति महीनों की नीतिगत तैयारी पर भारी पड़ जाती है।

विपक्ष को अपने नेतृत्व पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। नेतृत्व केवल भीड़ जुटाने, भाषण देने या सरकार पर हमला करने का नाम नहीं है। संगठन को दिशा देना, सहयोगी दलों को साथ रखना, स्पष्ट नीतियां बनाना और जनता के सामने वैकल्पिक शासन की विश्वसनीय तस्वीर रखना भी उसी का हिस्सा है। यदि विपक्ष यह काम मजबूत करता है तो उसे हर मुद्दे पर सरकार के पीछे चलने की जरूरत नहीं पड़ेगी; वह खुद एजेंडा तय करने की स्थिति में होगा।

सरकार का भी आलोचना का जवाब हर बार राजनीतिक पलटवार से देने के बजाय काम, आंकड़ों और परिणामों से देना अधिक प्रभावी है। उपलब्धियां सामने आएं और कमियों पर सुधार दिखे। सत्ता में होना सवालों से ऊपर होने का अधिकार नहीं देता। इसी तरह सरकार की हर आलोचना को राष्ट्रविरोध मान लेना भी उचित नहीं। सरकार और राष्ट्र एक नहीं हैं। सरकारें बदलती हैं, राष्ट्र और उसकी संस्थाएं बनी रहती हैं। इसलिए सरकार पर तीखे सवाल पूछना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय हित को राजनीतिक लाभ से ऊपर रखना राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी है।

भारत की परंपरा में असहमति नई बात नहीं है। शास्त्रार्थ की संस्कृति हमें बताती है कि सामने वाले को चुप कराना तर्क की जीत नहीं होती। बेहतर तर्क देना ही असली जवाब है। आज की राजनीति में भी यही कसौटी होनी चाहिए। किसी नेता की नकल करना आसान है, उसकी नीति के आंकड़ों को चुनौती देना कठिन; भाषण पर चुटकी लेना आसान है, उसके बदले पूरी कार्ययोजना रखना कठिन। लेकिन देश को कठिन काम करने वाली राजनीति चाहिए। राजनीतिक भाषा का असर समाज पर भी पड़ता है। नेता जिस तरह बोलते हैं, समर्थक उसी भाषा को आगे ले जाते हैं। इसलिए नीतिगत मतभेद को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलने से बचना होगा। व्यंग्य और राजनीतिक हास्य लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उन्हें मूल मुद्दों की जगह नहीं लेनी चाहिए।

इसलिए विपक्ष से एक सीधी-सी बात कही जा सकती है—सरकार का विरोध कम मत कीजिए, उसे ज्यादा सार्थक कीजिए। हर सवाल पूछिए, लेकिन जवाब भी तैयार रखिए। हर कमी बताइए, लेकिन समाधान भी रखिए। और नेतृत्व पर भी उतना ही विचार कीजिए जितना सरकार पर करते हैं। कभी-कभी अपने ही मंच का आईना देखना भी उपयोगी होता है—वहां विपक्ष दिखाई दे रहा है या केवल सरकार का विरोध?

लोकतंत्र को कमजोर विपक्ष नहीं, सुदृढ़ और मर्यादित विपक्ष चाहिए। सरकार को जवाबदेह रखने के लिए विपक्ष को स्वयं भी जवाब देने योग्य बनना होगा। राजनीति में व्यंग्य की जगह रहे, लेकिन नीति की जगह उससे बड़ी हो; असहमति की आवाज ऊंची हो, लेकिन उसके पीछे विचार उससे ऊंचा हो। जनता को केवल यह नहीं जानना कि सरकार से नाराज कौन है। वह यह भी देखना चाहती है कि देश चलाने की तैयारी किसके पास है। विरोध हो, लेकिन विकल्प के साथ; सवाल हों, लेकिन तथ्यों के साथ; व्यंग्य हो, लेकिन मर्यादा के भीतर … और नेतृत्व हो तो केवल सत्ता पाने के लिए नहीं, सत्ता संभालने की तैयारी के साथ।