– पूर्णेन्दु पुष्पेश
अंत्योदय की बात वहीं से शुरू होती है, जहां विकास की चमक सबसे कम दिखाई देती है। समाज का वह व्यक्ति, जो सबसे पीछे है, जिसके पास साधन सीमित हैं और अवसरों तक पहुंच मुश्किल है, अगर विकास की मुख्यधारा में आ रहा है तो यही किसी भी सरकार की विकास नीति की सबसे बड़ी सफलता मानी जानी चाहिए। भारत आज तेज आर्थिक विकास के दौर से गुजर रहा है। 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि बताती है कि देश की अर्थव्यवस्था में गति बनी हुई है। लेकिन इस गति का असली अर्थ तभी है, जब इसका लाभ गांव, गरीब, किसान, श्रमिक, महिला और युवा तक पहुंचे।
अंत्योदय का अर्थ केवल अंतिम व्यक्ति तक सहायता पहुंचाना नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ने का अवसर देना है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का यह विचार आज भी इसलिए प्रासंगिक है कि विकास की असली कसौटी आंकड़ों से ज्यादा आम आदमी की जिंदगी में होने वाला बदलाव है। भारत कितना आगे बढ़ा, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि इस बढ़ते भारत में वह व्यक्ति कितना आगे आया, जो अब तक पीछे था।
पिछले वर्षों में केंद्र सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, वित्तीय समावेशन, डिजिटल सेवाओं, कौशल विकास, आवास, सड़क, बिजली और सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाया है। दीनदयाल अंत्योदय योजना और ग्रामीण कौशल विकास जैसी पहल इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं। इन प्रयासों का मूल्य केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि इससे तय होना चाहिए कि कितने लोग अपने पैरों पर खड़े होने की स्थिति में आए और कितने परिवारों के जीवन में स्थायी बदलाव आया।
तेज आर्थिक विकास अपने साथ नई संभावनाएं लेकर आता है, लेकिन उसकी सार्थकता रोजगार, आय और अवसरों में दिखनी चाहिए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो, छोटे कारोबार आगे बढ़ें और युवाओं को अपनी योग्यता के अनुसार काम मिले। गरीब को केवल सहायता नहीं, आत्मनिर्भर बनने का रास्ता चाहिए। किसान को राहत के साथ बेहतर तकनीक, सिंचाई और बाजार चाहिए। श्रमिक को रोजगार के साथ कौशल और सामाजिक सुरक्षा चाहिए। महिला को योजनाओं के लाभ के साथ शिक्षा, संपत्ति, उद्यमिता और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी चाहिए।
ग्रामीण युवा के लिए भी ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिसमें बेहतर भविष्य के लिए शहर की ओर पलायन ही एकमात्र विकल्प न हो। गांव और छोटे शहरों में कौशल, डिजिटल सुविधा, उद्यम और रोजगार का वातावरण बनाना होगा। यही वह जगह है जहां सरकारी योजनाओं का वास्तविक असर दिखाई देना चाहिए। विकास का मतलब केवल सुविधा उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उस सुविधा को अवसर में बदलना भी है।
डिजिटल तकनीक ने शासन और जनसेवा की पहुंच बढ़ाने का रास्ता खोला है। लेकिन तकनीक तभी बदलाव लाएगी, जब अंतिम व्यक्ति उसे समझ और इस्तेमाल कर सके। बैंक खाता खुलना महत्वपूर्ण है, पर उसका सुरक्षित इस्तेमाल भी जरूरी है। सड़क, बिजली और इंटरनेट की असली उपयोगिता तब है, जब उनसे बच्चे स्कूल, किसान बाजार, मरीज अस्पताल और युवा रोजगार तक आसानी से पहुंच सकें। यानी विकास की हर सुविधा का अंतिम लक्ष्य जीवन को आसान और अवसरों को व्यापक बनाना होना चाहिए।
2047 का विकसित भारत केवल बड़ी अर्थव्यवस्था का नाम नहीं हो सकता। उसके केंद्र में विकसित गांव, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार, मजबूत कौशल और सामाजिक सुरक्षा भी होनी चाहिए। सरकार ने विकास का आधार मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अब जरूरत है कि योजनाओं की पहुंच और परिणामों पर और ज्यादा ध्यान दिया जाए। लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचे, स्थानीय स्तर पर निगरानी मजबूत हो और सरकारी सहायता आत्मनिर्भरता का रास्ता खोले, यही अगली बड़ी चुनौती है।
अंत्योदय दिवस को इसी नजरिए से देखना चाहिए। यह केवल पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती नहीं, बल्कि विकास की दिशा पर विचार करने का अवसर है। सरकार के प्रयासों को और गति देने के साथ राज्यों, स्थानीय संस्थाओं, उद्योग, समाज और नागरिकों की भागीदारी भी बढ़ानी होगी। योजनाएं तभी सफल मानी जाएंगी, जब उनका असर कागज से निकलकर जमीन पर दिखाई दे।
भारत की विकास यात्रा अब उस मुकाम पर है, जहां केवल गति काफी नहीं होगी। पहुंच, गुणवत्ता और परिणाम भी उतने ही जरूरी होंगे। जब अंतिम गांव में अवसर बढ़ेंगे, युवा को कौशल मिलेगा, परिवार को सम्मानजनक जीवन मिलेगा और गरीब खुद को व्यवस्था का लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास का भागीदार महसूस करेगा, तभी विकसित भारत की नींव मजबूत होगी।
विकास की अंतिम कसौटी यही है कि देश की तरक्की का लाभ आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक कितनी ताकत के साथ पहुंचा। गरीब को हमेशा सहायता का पात्र बनाए रखना अंत्योदय नहीं है; उसे अवसर, सम्मान और आत्मनिर्भरता का अधिकार देना अंत्योदय है। बड़ी अर्थव्यवस्था, ऊंची विकास दर और आधुनिक बुनियादी ढांचा जरूरी हैं, लेकिन इनकी सार्थकता तभी है जब इनके बीच कोई परिवार भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा या अवसरों की कमी से अपनी संभावनाएं न खोए। विकसित भारत केवल मजबूत भारत नहीं, बल्कि ऐसा भारत होना चाहिए जिसमें विकास ऊपर से नीचे बांटा न जाए, बल्कि नीचे से ऊपर तक अवसर पैदा करे। जब आखिरी व्यक्ति व्यवस्था का लाभार्थी भर नहीं, अपने भविष्य का निर्माता बनेगा, तभी अंत्योदय विचार से निकलकर विकास की वास्तविक तस्वीर बनेगा। यही वह बिंदु है जहां आर्थिक प्रगति राष्ट्र निर्माण में बदलती है और विकसित भारत का संकल्प जमीन पर उतरता है।

