– पूर्णेन्दु पुष्पेश
अपने दुख को समझना आसान है, क्योंकि उसकी चोट हमें लगती है। मुश्किल यह है कि हम दूसरे के दर्द को भी उतनी ही गंभीरता से महसूस करें। आज हमारी जिंदगी में यही कमी तेजी से दिखाई दे रही है। किसी के घर में मातम हो, किसी का रोजगार छिन गया हो, कोई बीमारी से जूझ रहा हो या किसी के साथ अन्याय हुआ हो, हम कुछ पल ठहरते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। जैसे दूसरे का दर्द हमारी जिंदगी का हिस्सा ही न हो।
तकनीक ने दुनिया को करीब जरूर किया है, लेकिन संवेदना को जरूरी नहीं कि गहरा किया हो। मोबाइल पर हर दिन हजारों दुख हमारे सामने आते हैं। दुर्घटना का वीडियो, किसी परिवार की मदद की गुहार, किसी बच्चे की मजबूरी, किसी बुजुर्ग की बेबसी—सब कुछ हमारी आंखों के सामने है। लेकिन देखते-देखते हम इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि दर्द भी अब कई बार सिर्फ एक खबर, एक पोस्ट या एक वीडियो बनकर रह जाता है। उंगली स्क्रीन पर चलती है और किसी की तकलीफ हमारी नजर से ओझल हो जाती है।
यहीं व्यक्ति की जिम्मेदारी शुरू होती है। संवेदनशील होने का मतलब हर समस्या अपने सिर ले लेना नहीं है। हर किसी की मदद करना संभव भी नहीं। लेकिन किसी की परेशानी देखकर उसे अनदेखा कर देना भी सामान्य व्यवहार नहीं होना चाहिए। कभी किसी की बात ध्यान से सुन लेना, जरूरतमंद को सही जगह पहुंचा देना, किसी पीड़ित को अकेला न छोड़ना या अपनी क्षमता के अनुसार छोटी-सी मदद कर देना भी संवेदनशीलता है। कई बार व्यक्ति को पैसे से ज्यादा भरोसे और साथ की जरूरत होती है।
समाज की संवेदनशीलता की असली पहचान इस बात से होती है कि वह कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है। किसान की फसल बर्बाद हो जाए, मजदूर का काम चला जाए, किसी परिवार के सामने इलाज का संकट हो, बुजुर्ग अकेला पड़ जाए या किसी बच्चे की पढ़ाई पैसे के अभाव में रुक जाए—इन परिस्थितियों में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि यह उसकी निजी समस्या है। समाज अगर अपने कमजोर लोगों के लिए खड़ा नहीं होता तो उसकी प्रगति अधूरी है।
यह संवेदनशीलता सार्वजनिक व्यवस्था में भी दिखनी चाहिए। थाने में अपनी शिकायत लेकर आया व्यक्ति केवल एक आवेदन नहीं है। सरकारी दफ्तर में महीनों से भटक रहा नागरिक केवल एक फाइल नहीं है। उसके पीछे एक परिवार, एक उम्मीद और कई बार पूरी जिंदगी का सवाल होता है। नियम जरूरी हैं, प्रक्रिया जरूरी है, लेकिन व्यवस्था की सफलता इस बात से भी तय होती है कि उसके सामने खड़े व्यक्ति की परेशानी को कितनी गंभीरता से समझा गया।
हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं जिनकी परेशानी दिखाई देती है, लेकिन हम उसे अपना विषय नहीं मानते। सड़क पर घायल व्यक्ति को देखकर निकल जाना, किसी बुजुर्ग की मदद की जरूरत को नजरअंदाज करना, पड़ोस में संकट से जूझ रहे परिवार से हाल तक न पूछना या किसी पीड़ित की परेशानी को सोशल मीडिया की चर्चा तक सीमित कर देना इसी उदासीनता के उदाहरण हैं। हर समस्या का समाधान हमारे पास नहीं होगा, लेकिन हर समस्या से मुंह मोड़ लेना भी हमारी मजबूरी नहीं है।
संवेदनशीलता केवल भावना नहीं, व्यवहार है। यह तब दिखाई देती है जब हम किसी की बात बीच में काटने के बजाय सुनते हैं, किसी की मजबूरी पर हंसने के बजाय उसका हाथ थामते हैं, अन्याय देखकर चुप रहने के बजाय उचित तरीके से आवाज उठाते हैं और सोशल मीडिया पर किसी की पीड़ा को मनोरंजन बनाने से रोकते हैं। समाज को संवेदनशील बनाने की शुरुआत किसी बड़े अभियान से नहीं, व्यक्ति के छोटे-छोटे व्यवहार से होती है।
आज जरूरत है कि हम अपने भीतर और अपने आसपास संवेदना को फिर जगह दें। बच्चों को केवल सफल होना नहीं, दूसरों की तकलीफ समझना भी सिखाना होगा। परिवार में संस्कार, स्कूल में मानवीय मूल्य और समाज में जिम्मेदारी—इन तीनों के बिना संवेदनशील नागरिक तैयार नहीं हो सकते।
आखिरकार, समाज की असली ताकत इस बात से नहीं मापी जाती कि उसके पास कितनी संपत्ति, तकनीक या सुविधाएं हैं। यह भी देखना होगा कि वहां किसी कमजोर की आवाज कितनी दूर तक सुनाई देती है। अपने आंसू महसूस करना स्वाभाविक है, लेकिन दूसरे की आंख का आंसू देखकर रुक जाना मनुष्यता है। हर आंसू पोंछना हमारे बस में नहीं, लेकिन किसी के आंसू को अनदेखा न करना हमारे बस में जरूर है। यही संवेदनशील व्यक्ति की पहचान और संवेदनशील समाज की बुनियाद है।

