लोकतंत्र में सवाल जरूरी हैं, भरोसा भी

– Purnendu Pusshpesh

लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है। सवाल नहीं होंगे तो सत्ता जवाबदेह कैसे रहेगी और विपक्ष अपनी भूमिका कैसे निभाएगा? सरकार की आलोचना हो, चुनाव आयोग के फैसले पर आपत्ति हो या किसी नीति से असहमति….इन सबकी लोकतंत्र में पूरी जगह है। लेकिन सवाल और आरोप के बीच एक बुनियादी फर्क है। सवाल जवाब मांगता है, आरोप के साथ प्रमाण भी चाहिए।

देश में इस समय चुनावी व्यवस्था को लेकर बहस तेज है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है और 2024 के लोकसभा तथा अन्य चुनावों में गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगाए हैं। विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भी सवाल उठाए हैं। इन मुद्दों पर बहस होनी चाहिए, लेकिन बहस का आधार तथ्य और प्रमाण होना चाहिए।

चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाना राजनीतिक अधिकार है, लेकिन उसे साबित करना भी उतना ही जरूरी है। लोकतंत्र इस बात से तय नहीं होता कि कौन सबसे ऊंची आवाज में क्या कह रहा है। असली कसौटी यह है कि आरोप के पीछे दस्तावेज क्या हैं, नियम क्या कहते हैं और जांच में क्या सामने आता है। किसी चुनाव परिणाम पर सवाल है तो उसके लिए उपलब्ध संवैधानिक और कानूनी रास्ते भी हैं। उन्हें छोड़कर केवल राजनीतिक बयानबाजी से निष्कर्ष निकालना जनता के भरोसे को कमजोर कर सकता है।

चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत गठित संवैधानिक संस्था है। उसे देश में चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी गई है। इसका अर्थ यह नहीं कि आयोग सवालों से ऊपर है। जिस संस्था के हाथ में करोड़ों मतदाताओं के अधिकार की जिम्मेदारी है, उससे जवाब मांगना बिल्कुल जायज है। मतदाता सूची में किसी नाम के जुड़ने या हटने का मामला हो, एसआईआर पर आपत्ति हो या आयोग के किसी फैसले को लेकर संदेह….हर गंभीर सवाल का जवाब सार्वजनिक और तथ्यपूर्ण तरीके से मिलना चाहिए।

हाल के विवाद में आयोग के कामकाज और उसके भीतर मतभेद को लेकर भी सवाल उठे हैं। विपक्षी दल इन्हें गंभीर चिंता का आधार बता रहे हैं। ऐसे मामलों में राजनीतिक बयान से ज्यादा जरूरी है कि पूरा तथ्य सामने आए –किस फैसले पर क्या आपत्ति हुई, किस नियम के तहत निर्णय लिया गया और उसका मतदाताओं पर क्या प्रभाव पड़ा। जनता को शोर नहीं, साफ जानकारी चाहिए।

यही जिम्मेदारी विपक्ष की भी है। सरकार का विरोध करना उसका अधिकार है। संसद से सड़क तक आंदोलन करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन चुनावी संस्था पर गंभीर आरोप लगाते समय प्रमाण सामने रखना भी विपक्ष का दायित्व है। हर चुनाव हारने के बाद परिणाम को धांधली और हर जीत को निष्पक्ष मानने की राजनीति आखिरकार चुनाव से ज्यादा जनता के भरोसे को नुकसान पहुंचाएगी।

हमारे लोकतंत्र की असली पूंजी केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि चुनाव के परिणाम पर व्यापक सार्वजनिक विश्वास है। सरकारें बदलेंगी, दल हारेंगे-जीतेंगे और नेता आते-जाते रहेंगे। लेकिन चुनावी व्यवस्था पर भरोसा टूट गया तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।

इसलिए न चुनाव आयोग को सवालों से बचाया जाना चाहिए और न बिना प्रमाण उसके पूरे कामकाज को कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। जहां गलती है, वहां जांच हो; जहां गलती साबित हो, वहां सुधार हो और जहां आरोप तथ्यहीन हों, वहां यह बात भी स्पष्ट रूप से सामने आए। लोकतंत्र अंधविश्वास से नहीं, प्रमाण और पारदर्शिता से मजबूत होता है।

राजनीतिक संघर्ष अपनी जगह है, राष्ट्र अपनी जगह। किसी सरकार की आलोचना करना और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना एक ही बात नहीं है। नेताओं के शब्द केवल उनके समर्थक नहीं सुनते, पूरा देश सुनता है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में जितनी आजादी जरूरी है, उतनी ही जिम्मेदारी भी।

सत्ता से सवाल लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन बिना प्रमाण संस्थाओं पर अविश्वास फैलाना लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है। चुनाव किसी दल की संपत्ति नहीं, जनता का अधिकार है; संविधान किसी सरकार की ढाल नहीं, पूरे राष्ट्र का आधार है। सरकारें और राजनीतिक चेहरे बदलते रहेंगे, लेकिन भारत का लोकतांत्रिक ढांचा बना रहना चाहिए। इसलिए बहस हो, विरोध हो, आंदोलन हो….मगर तथ्य के साथ। आरोप हो…तो प्रमाण के साथ। और राजनीति कितनी भी तीखी क्यों न हो, संविधान और राष्ट्रहित से ऊपर कुछ नहीं। सबसे ऊपर भारत।