देश की सीमा नक्शे पर है, राष्ट्र की सीमा जनता के भीतर

– Purnendu Pusshpesh

किसी देश की पहचान सबसे पहले उसके नक्शे से होती है। सीमाएं तय करती हैं कि यह जमीन यहां से शुरू होती है और वहां खत्म। लेकिन देश केवल उतनी जमीन का नाम नहीं है, जिस पर किसी राष्ट्र का झंडा फहरता है। जमीन राष्ट्र का भूगोल बनाती है, जनता उसका जीवन। सीमा देश की रक्षा कर सकती है, लेकिन देश की आत्मा को कोई सीमा नहीं बचाती। उसे बचाए रखते हैं वे लोग, जो उस जमीन को अपना मानकर उसके साथ जीते हैं।

भारत को समझने के लिए यही फर्क समझना जरूरी है। कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से अरुणाचल तक फैली जमीन भारत है, लेकिन केवल इसलिए नहीं कि नक्शे पर उसकी सीमाएं तय हैं। भारत इसलिए भारत है क्योंकि इस भूभाग में रहने वाले करोड़ों लोगों ने सदियों की विविधता के बीच एक साझा जीवन-बोध विकसित किया है। भाषाएं अलग हैं, भोजन अलग है, पूजा-पद्धतियां अलग हैं, पहनावे अलग हैं, यहां तक कि इतिहास को देखने के नजरिए भी अलग-अलग हैं। फिर भी किसी मोड़ पर ये सारी विविधताएं एक बड़े परिचय में आकर मिल जाती हैं—हम भारतीय हैं।

यही वह जगह है जहां राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं रहता, एक जीवंत सामाजिक अनुभव बन जाता है। राष्ट्र किसी सरकारी अधिसूचना से पैदा नहीं होता। वह पीढ़ियों के विश्वास, साझा स्मृतियों, संघर्षों और भविष्य की उम्मीदों से बनता है। इसलिए राष्ट्र की मजबूती केवल अर्थव्यवस्था, सेना या तकनीक के आंकड़ों में नहीं देखी जा सकती। यह भी देखना पड़ता है कि समाज अपने भीतर कितना भरोसा बचाए हुए है।

राष्ट्रभक्ति को लेकर भी हमारे यहां अक्सर एक दिलचस्प भ्रम दिखाई देता है। तिरंगा, राष्ट्रगान, सैनिक और राष्ट्रीय पर्व—इन सबके साथ देशभक्ति की तस्वीर सहज रूप से जुड़ जाती है। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन राष्ट्रभक्ति का एक दूसरा, कम दिखाई देने वाला चेहरा भी है। वह तब सामने आता है जब कोई व्यक्ति अपने काम के साथ बेईमानी नहीं करता, सार्वजनिक संपत्ति को निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल नहीं करता, किसी दूसरे नागरिक के अधिकार पर कब्जा नहीं करता और अपने छोटे से स्वार्थ के लिए व्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचाता।

यहीं राष्ट्रहित का सवाल भी जुड़ता है। राष्ट्रहित हमेशा किसी बड़े नारे में नहीं मिलता। कभी-कभी वह बहुत साधारण फैसले में छिपा होता है। सड़क पर नियम मानना, करों का ईमानदारी से भुगतान करना, सार्वजनिक संसाधनों की रक्षा करना, अपने काम में गुणवत्ता रखना या किसी गलत सूचना को केवल इसलिए आगे न बढ़ाना कि वह हमारी पसंद की बात कहती है—ये सब राष्ट्र के सामाजिक ढांचे को मजबूत करते हैं। इसके उलट छोटी-सी बेईमानी जब करोड़ों लोगों की आदत बन जाए तो उसका नुकसान किसी बड़े संकट से कम नहीं होता।

भारत जैसे देश में एक और चुनौती है—हमारी अनेक पहचानें। जाति, भाषा, क्षेत्र, धर्म, विचार और राजनीतिक पसंद समाज की वास्तविकताएं हैं। इन्हें मिटाना न संभव है, न जरूरी। परेशानी तब पैदा होती है जब इनमें से कोई एक पहचान हमारी साझा राष्ट्रीय पहचान पर इतनी हावी हो जाए कि सामने वाला पहले भारतीय न दिखे, केवल विरोधी दिखाई दे। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं; समाज का बिखराव स्वाभाविक नहीं होना चाहिए।

इसका अर्थ यह भी नहीं कि राष्ट्रहित के नाम पर सवाल पूछना बंद कर दिया जाए। किसी सरकार की नीति पर सवाल उठाना, प्रशासन की कमी बताना, भ्रष्टाचार पर आवाज उठाना या किसी संस्था से जवाब मांगना राष्ट्रविरोध नहीं है। उलटे, स्वस्थ लोकतंत्र में यह जरूरी है। फर्क सिर्फ इतना है कि आलोचना का उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर करने का होना चाहिए, समाज में अविश्वास पैदा करने का नहीं। राष्ट्र से प्रेम का अर्थ यह नहीं कि उसकी कमियां दिखाई न दें; अर्थ यह है कि कमियां दिखें तो उन्हें सुधारने की इच्छा भी बनी रहे।

आज यह बात इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारे हाथ में एक ऐसा माध्यम है, जो एक साथ लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। मोबाइल की स्क्रीन पर आई कोई तस्वीर, वीडियो या संदेश कुछ ही मिनटों में सच का रूप ले सकता है, जबकि उसकी सत्यता जांचने में घंटों लग सकते हैं। इस दौर में सूचना को परखना केवल तकनीकी सावधानी नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी बन गया है। क्योंकि झूठ जब सामूहिक विश्वास को प्रभावित करने लगे तो उसका नुकसान केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।

राष्ट्र निर्माण की तस्वीर इसलिए केवल सीमा पर खड़े सैनिक से पूरी नहीं होती। किसान खेत में, श्रमिक निर्माण स्थल पर, शिक्षक कक्षा में, वैज्ञानिक प्रयोगशाला में, डॉक्टर अस्पताल में, उद्यमी उद्योग में और पत्रकार अपने शब्दों में राष्ट्र को गढ़ रहे होते हैं। एक ईमानदार कर्मचारी, जिम्मेदार नागरिक और अपने काम को गंभीरता से लेने वाला सामान्य व्यक्ति भी उतना ही महत्वपूर्ण है। राष्ट्र असाधारण लोगों से ही नहीं, करोड़ों सामान्य लोगों के असाधारण अनुशासन से आगे बढ़ता है।

शायद इसी वजह से देश को लेकर सबसे जरूरी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि देश हमारे लिए क्या कर रहा है, बल्कि यह भी होना चाहिए कि हम जिस देश की कल्पना करते हैं, उसमें हमारा अपना योगदान क्या है। यह सवाल किसी उपदेश की तरह नहीं, आत्ममंथन की तरह है। और शायद राष्ट्रभक्ति का सबसे परिपक्व रूप भी यही है -भावना के साथ विवेक।

सीमाएं हमें बताती हैं कि देश कहां तक है। जनता तय करती है कि वह देश कैसा होगा। सरकारें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं, पीढ़ियां बदलती हैं, लेकिन राष्ट्र का वास्तविक चरित्र समाज के व्यवहार में दिखाई देता है। इसलिए भारत की मजबूती केवल सीमा पर नहीं, समाज के भीतर भी तय होती है।

नक्शे पर खींची रेखाएं देश की सीमा तय करती हैं, लेकिन करोड़ों लोगों का साझा विश्वास उसे राष्ट्र बनाता है। भारत की असली शक्ति उसकी जमीन जितनी ही उसकी जनता में है। इसलिए राष्ट्रभक्ति किसी अवसर पर व्यक्त की जाने वाली भावना भर नहीं, देश के प्रति एक जीवंत संबंध है। जिस दिन हम अपने निजी हित, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय हित के बीच इस रिश्ते को समझने लगेंगे, उसी दिन देश केवल हमारा रहने का भूखंड नहीं रहेगा….वह हमारी साझा जिम्मेदारी और साझा भविष्य बन जाएगा।