खनिज संपदा की कमाई बड़ी, निगरानी का तंत्र कमजोर

– PURNENDU PUSSHPESH

झारखंड की खनिज संपदा राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। खान एवं भूतत्व विभाग सरकार को राजस्व देने वाले प्रमुख विभागों में दूसरे स्थान पर है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, राज्य के अपने गैर-कर राजस्व में खनन की हिस्सेदारी करीब 85 प्रतिशत है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में विभाग ने 3,885.11 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले 4,013.53 करोड़ रुपये राजस्व जुटाया। चालू वित्तीय वर्ष के लिए 4,500 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा गया है। ये आंकड़े विभाग की आर्थिक अहमियत बताते हैं। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा करते हैं। जब राज्य की कमाई का इतना बड़ा हिस्सा खनन पर निर्भर है, तो इसकी निगरानी करने वाला विभाग बुनियादी संसाधनों के लिए क्यों जूझ रहा है?

हकीकत यह है कि झारखंड के सभी 24 जिलों में जिला खनन पदाधिकारियों के पास अपना सरकारी वाहन तक नहीं है। निरीक्षण और छापेमारी के लिए उन्हें किराये के वाहनों पर निर्भर रहना पड़ता है। राज्य में महज 37 माइनिंग इंस्पेक्टर हैं। यानी 24 जिलों के लिए औसतन दो से भी कम इंस्पेक्टर। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि विभाग के पास एक भी अपना सर्वेयर नहीं है। खनन पट्टे की सीमा तय करने, स्वीकृत क्षेत्र से बाहर हो रहे उत्खनन का पता लगाने और वास्तविक खनन की मात्रा का आकलन करने के लिए सर्वेयर जरूरी हैं। इनके बिना लीज क्षेत्रों की नियमित और तकनीकी निगरानी कैसे संभव है? ऐसे में अवैध खनन पर प्रभावी रोक की उम्मीद करना खुद से ही सवाल करने जैसा है।

इस कमजोरी को समझने के लिए बिहार और ओडिशा के उदाहरण सामने हैं। बिहार में खनन विभाग ने अपनी खान पुलिस की व्यवस्था की है। इसके तहत पुलिसकर्मियों, सेवानिवृत्त रक्षा कर्मियों और अर्द्धसैनिक बलों को नियुक्त किया जाता है। अवैध खनन या खनिज परिवहन की सूचना मिलने पर विभाग अपनी टीम के साथ कार्रवाई कर सकता है। जरूरत पड़ने पर राज्य पुलिस की मदद ली जाती है, लेकिन हर कार्रवाई के लिए उसी पर निर्भरता नहीं रहती। झारखंड में स्थिति उलट है। यहां जिला खनन पदाधिकारी को छापेमारी के लिए स्थानीय या जिला पुलिस से बल मांगना पड़ता है। पुलिस पहले से ही कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण और दूसरी जिम्मेदारियों में व्यस्त रहती है। जवानों की कमी भी है। ऐसे में समय पर बल मिलना मुश्किल होता है। बिना सुरक्षा के अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई करना अधिकारियों की जान जोखिम में डालने जैसा है। नतीजा यह कि कार्रवाई की गति और प्रभाव दोनों प्रभावित होते हैं।

ओडिशा में खनन निगरानी के लिए अधिकारियों और माइनिंग इंस्पेक्टरों के साथ सर्वेयर और तकनीकी कर्मचारियों की भी व्यवस्था है। बड़े खनन जिलों में फील्ड स्तर पर अलग-अलग टीमें काम करती हैं। लीज की सीमाओं और उत्खनन की मात्रा की जांच के लिए सर्वे और तकनीकी संसाधनों का उपयोग किया जाता है। झारखंड में इसके उलट सीमित कर्मचारियों और साधनों के सहारे अवैध बालू, कोयला, बॉक्साइट, पत्थर और ग्रेनाइट खनन रोकने की जिम्मेदारी निभाई जा रही है। एक ओर राजस्व वसूली का लक्ष्य बढ़ रहा है, दूसरी ओर निगरानी का ढांचा कमजोर बना हुआ है। यह विरोधाभास सरकार की प्राथमिकताओं पर विचार करने की जरूरत बताता है।

अवैध खनन का नुकसान केवल सरकारी खजाने तक सीमित नहीं है। इससे नदियों, जंगलों, जमीन और पर्यावरण को भी क्षति पहुंचती है। नियमों के विरुद्ध खनन से सरकारी राजस्व का नुकसान होता है और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा तथा आजीविका से जुड़ी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं। इसलिए विभाग की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसने साल भर में कितना राजस्व जुटाया। और कितना जुटा सकता था? कहीं अनाधिकारिक दोहन की मात्रा बहुत ज्यादा तो नहीं? यह भी देखना ही होगा कि खनिज संपदा का दोहन नियमों के तहत हो रहा है या नहीं।

झारखंड सरकार को अब इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। 24 जिलों के खनन पदाधिकारियों को सरकारी वाहन उपलब्ध कराना, 37 माइनिंग इंस्पेक्टरों की संख्या बढ़ाना और सर्वेयरों की नियुक्ति करना प्राथमिकता होनी चाहिए। बिहार की तरह खान विभाग की अपनी प्रशिक्षित प्रवर्तन टीम या विशेष सुरक्षा बल बनाने पर भी विचार किया जा सकता है। और जब तक यह व्यवस्था नहीं बनती, तब तक जिला पुलिस के साथ बेहतर समन्वय और छापेमारी के लिए तत्काल सुरक्षा बल उपलब्ध कराने की स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है।

सरकार के सामने 4,500 करोड़ रुपये का राजस्व लक्ष्य है। लेकिन केवल लक्ष्य बढ़ाने से व्यवस्था मजबूत नहीं होगी। जिस विभाग से राज्य को इतनी बड़ी कमाई होती है, उसे निगरानी के लिए जरूरी साधन और कर्मचारी देना भी सरकार की जिम्मेदारी है। झारखंड की खनिज संपदा तभी राज्य की असली ताकत बनेगी, जब उसकी सुरक्षा, पारदर्शी निगरानी और उचित राजस्व वसूली के लिए मजबूत तंत्र भी तैयार होगा।