– Purnendu Pusshpesh
झारखंड सरकार की वित्तीय तस्वीर इस समय ऐसी है, जिसे केवल “पैसा कम मिला” कहकर टाला नहीं जा सकता। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 के पांच महीने बीत चुके हैं और आधारभूत संरचनाओं पर अब तक 3,762.29 करोड़ रुपये ही खर्च हुए हैं। अगस्त के अंत तक सरकार की कुल आमदनी 40,287.67 करोड़ रुपये रही, जबकि 38,979.61 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे। यानी महीने के अंत में सरकार के पास करीब 1,318 करोड़ रुपये ही बचे थे। ये आंकड़े सरकार की वित्तीय स्थिति और उसकी व्यवस्थागत चुनौतियों, दोनों पर सवाल खड़े करते हैं।
सरकार ने पूरे साल के लिए 1.57 लाख करोड़ रुपये से अधिक की आमदनी का लक्ष्य रखा है। अगस्त तक उसकी उपलब्धि करीब 25.55 प्रतिशत रही। इसमें सबसे बड़ी चिंता जीएसटी को लेकर है। 20,937.27 करोड़ रुपये के वार्षिक लक्ष्य के मुकाबले अगस्त तक सिर्फ 4,814.89 करोड़ रुपये मिले, यानी करीब 23 प्रतिशत। भू-राजस्व की स्थिति तो और कमजोर है। 1,999.03 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले केवल 183.44 करोड़ रुपये की प्राप्ति हुई। स्टांप और निबंधन, उत्पाद तथा वैट जैसे मद भी सालाना लक्ष्य की तुलना में आधे से काफी नीचे हैं।
यहां सरकार को अपने बचाव में यह जरूर कहना है कि केंद्रीय सहायता अनुदान के रूप में 18,214.38 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान था, लेकिन अगस्त तक यह राशि नहीं मिली। केंद्र से मिलने वाली राशि राज्य की वित्तीय संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 2026-27 के बजट विश्लेषण में भी केंद्र से राज्य के राजस्व प्राप्तियों में बड़ी हिस्सेदारी आने का अनुमान रखा गया है। इसलिए केंद्र से अपेक्षित राशि में देरी का असर विकास योजनाओं पर पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन यहीं से राज्य सरकार की अपनी जिम्मेदारी का सवाल भी शुरू होता है।
आखिर हर वित्तीय कठिनाई का समाधान केंद्र की ओर देखने से तो नहीं होगा। सरकार को यह बताना पड़ेगा कि अपने कर और गैर-कर राजस्व को बढ़ाने के लिए उसकी ठोस रणनीति क्या है। जीएसटी संग्रह लक्ष्य से इतना पीछे क्यों है? भू-राजस्व में इतनी कम वसूली क्यों हो रही है? सरकारी संपत्तियों, खनन, परिवहन, निबंधन और दूसरे राजस्व स्रोतों की क्षमता का पूरा उपयोग क्यों नहीं हो पा रहा? क्या राजस्वों के एकत्रीकरण मे कोई ‘लीकेज’ तो नहीं है? इन सवालों के जवाब केवल बजट भाषण में नहीं, जमीन पर दिखने चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल खर्च की प्राथमिकता का है। अगस्त तक 35,217.32 करोड़ रुपये राजस्व खर्च में चले गए, जबकि आधारभूत संरचना पर 3,762.29 करोड़ रुपये खर्च हुए। वेतन, पेंशन, ब्याज और दूसरी जरूरी जिम्मेदारियां सरकार के लिए अनिवार्य हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन झारखंड जैसे राज्य में सड़क, सिंचाई, बिजली, पेयजल, स्वास्थ्य और शिक्षा की आधारभूत सुविधाएं मजबूत किए बिना विकास का दावा अधूरा रहेगा। सरकार के 2026-27 के बजट में पूंजीगत परिव्यय 24,791 करोड़ रुपये प्रस्तावित है, जो पिछले संशोधित अनुमान से 11 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में असली कसौटी यह होगी कि साल के अंत तक इस प्रावधान का कितना हिस्सा जमीन पर दिखाई देता है।
वित्तीय अनुशासन का मतलब सिर्फ खर्च रोकना नहीं है। सही मायने में अनुशासन यह है कि सीमित संसाधनों से अधिकतम सार्वजनिक लाभ पैदा किया जाए। सरकार को गैर-जरूरी खर्चों पर नजर रखनी होगी, योजनाओं की प्राथमिकता तय करनी होगी और विभागों के बीच समन्वय बेहतर करना होगा। पैसा कम हो तो सबसे पहले वही काम होना चाहिए, जिसका असर सीधे आम आदमी की जिंदगी पर पड़े।
झारखंड के पास प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं है। कमी अगर कहीं दिखती है तो राजस्व संग्रह की क्षमता, योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन और वित्तीय प्रबंधन में दिखाई देती है। केंद्र से मिलने वाली राशि राज्य का अधिकार और वित्तीय संरचना का हिस्सा है, लेकिन अपनी आमदनी बढ़ाना राज्य सरकार की भी जिम्मेदारी है। विकास का पहिया सिर्फ अनुदान से नहीं, मजबूत स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी चलता है।
इसलिए मौजूदा आंकड़ों को चेतावनी की तरह देखना चाहिए। सरकार के पास अभी पूरा वित्तीय वर्ष पड़ा है। जरूरत इस बात की है कि वह आंकड़ों की बाजीगरी से आगे बढ़कर राजस्व बढ़ाने, खर्च की गुणवत्ता सुधारने और अधूरी विकास योजनाओं को गति देने की स्पष्ट कार्ययोजना सामने रखे। झारखंड की जनता को यह जानने का अधिकार है कि खजाना कितना आया और कितना खर्च हुआ ही नहीं, बल्कि यह भी कि जो पैसा खर्च हुआ, उससे जमीन पर बदला क्या? यही सवाल किसी भी सरकार की वित्तीय व्यवस्था की असली परीक्षा है।

