= Purnendu Pusshpesh
जीएसटी को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का आलेख एक ऐसी कर व्यवस्था की दिशा दिखाता है, जिसका मकसद सिर्फ सरकार का राजस्व बढ़ाना नहीं, बल्कि कारोबार को आसान बनाना भी है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने कर व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने, प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने और कर चोरी पर लगाम लगाने की कोशिश की है। अब जीएसटी के अगले चरण में दरों को तर्कसंगत बनाने और अनुपालन आसान करने की बात सामने आ रही है। इससे सरकार की वह मंशा साफ दिखती है कि आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़े और भारतवासियों के लिए कारोबार करना पहले से सहज हो।
इसके आंकड़े भी उत्साह बढ़ाते हैं। अक्टूबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच कर-योग्य आपूर्ति में 25.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अप्रैल-सितंबर 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 12.46 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि से 11.6 प्रतिशत अधिक है। जीएसटी पंजीकरण बढ़कर करीब 1.71 करोड़ हो जाना भी बताता है कि अधिक से अधिक कारोबार औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं। यानी व्यवस्था का दायरा बढ़ रहा है और इसका आर्थिक आधार मजबूत हो रहा है।
लेकिन अब अगला कदम और महत्वपूर्ण है। सरकार ने जब जीएसटी को सरल बनाने का लक्ष्य सामने रखा है तो उसकी असली परीक्षा छोटे कारोबारी के स्तर पर होगी। बड़े उद्योगों के पास विशेषज्ञ और कर सलाहकार हैं, लेकिन छोटे दुकानदार, कारीगर, स्थानीय निर्माता, सेवा प्रदाता और पहली बार कारोबार शुरू करने वाले युवा के लिए हर तकनीकी प्रक्रिया आसान होना जरूरी है। सरल जीएसटी का मतलब केवल दरें कम करना नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि सामान्य कारोबारी को बार-बार विशेषज्ञ की मदद लेने की जरूरत न पड़े और छोटी तकनीकी गलती उसके लिए बड़ी परेशानी न बन जाए।
रिफंड के मोर्चे पर भी तस्वीर सकारात्मक है। अप्रैल-सितंबर के दौरान करीब 1.80 लाख करोड़ रुपये के रिफंड का उल्लेख है और राज्यों की एसजीएसटी प्राप्तियों में करीब 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह बताता है कि जीएसटी का लाभ केंद्र के साथ राज्यों तक भी पहुंच रहा है। फिर भी कारोबार के लिए सिर्फ रिफंड मिलना पर्याप्त नहीं है, वह समय पर मिले, यह ज्यादा जरूरी है। किसी कारोबारी की पूंजी अगर लंबे समय तक प्रक्रिया में फंसी रहती है तो उसका सीधा असर उसके कारोबार और रोजगार पर पड़ता है। इसलिए अगली पीढ़ी के सुधारों में गति भी उतनी ही जरूरी है जितनी प्रक्रिया की शुद्धता।
कर चोरी रोकना भी जरूरी है और ईमानदार करदाता को अनावश्यक परेशानी से बचाना भी। तकनीक से फर्जी बिलिंग और कर चोरी पकड़ना आसान हुआ है, लेकिन हर तकनीकी गलती को धोखाधड़ी मान लेना उचित नहीं होगा। कर प्रशासन में सख्ती अपराधी के खिलाफ हो, लेकिन ईमानदार कारोबारी के प्रति व्यवस्था सहयोगी रहे। यही भरोसा कर अनुपालन को भी मजबूत करेगा।
एक अच्छी बात यह भी है कि जीएसटी को केंद्र की अकेली योजना के रूप में नहीं देखा जा रहा। यह केंद्र और राज्यों की साझी व्यवस्था है और जीएसटी परिषद उसका महत्वपूर्ण मंच है। सात अक्टूबर को प्रस्तावित सुधारों में पंजीकरण, रिटर्न, रिफंड, विवाद समाधान और इनपुट टैक्स क्रेडिट जैसे विषयों को आसान बनाने की दिशा बताती है कि सरकार अब व्यवस्था को केवल नियमों के नजरिये से नहीं, करदाता के अनुभव से भी देखने की कोशिश कर रही है। यही सोच सुधारों को जमीन पर असरदार बनाएगी।
आखिर विकसित भारत केवल बड़े उद्योगों और बड़े निवेश से नहीं बनेगा। छोटे शहरों का व्यापारी, गांव का निर्माता, महिला उद्यमी, स्टार्टअप और अपना पहला कारोबार शुरू करने वाला युवा भी उसकी आर्थिक ताकत होंगे। सरकार अगर इनके लिए कर व्यवस्था को सरल, स्थिर और भरोसेमंद बनाती है तो यह केवल टैक्स सुधार नहीं, अवसरों का विस्तार होगा।
इसलिए जीएसटी की अगली परीक्षा सिर्फ यह नहीं है कि सरकार कितना राजस्व जुटाती है। असली सवाल यह भी है कि क्या भारत का कारोबारी यह महसूस करता है कि व्यवस्था उसके साथ खड़ी है। सरकार की नीयत अगर विकास को गति देने और भारतवासियों की राह आसान करने की है, तो अगला जीएसटी उसी नीयत को जमीन पर दिखाने का अवसर है। राजस्व मजबूत हो, लेकिन उसके साथ भरोसा भी मजबूत हो। …….तभी जीएसटी विकसित भारत की अर्थव्यवस्था का सच्चा सहारा बनेगा।

