यूपीआई की लागत कौन उठाए, सवाल इससे बड़ा है कि इसका फायदा किसे मिलता है

  • Purnendu Pusshpesh

भारत में डिजिटल भुगतान की कहानी सिर्फ तकनीक की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जिसमें चाय बेचने वाला, सब्जी वाला, छोटा दुकानदार और आम ग्राहक भी बिना नकदी के अपना रोजमर्रा का काम चला रहा है। दस रुपये की चाय से लेकर बड़े कारोबारी भुगतान तक यूपीआई अब हमारी आर्थिक आदत बन चुका है। अगस्त 2026 में यूपीआई पर 24.50 अरब से अधिक लेन-देन दर्ज हुए। इतनी बड़ी पहुंच के बाद यूपीआई को केवल एक भुगतान सेवा मानना भी ठीक नहीं होगा। यह देश के डिजिटल आर्थिक ढांचे का हिस्सा बन चुका है।

यही वजह है कि 15 अक्टूबर 2026 से एमडीआर को लेकर बताए जा रहे बदलावों पर बहस केवल बैंक, ऐप या दुकानदार तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। असली सवाल यह है कि यूपीआई के संचालन की लागत का बोझ किस पर पड़े और इसके व्यापक फायदे का हिसाब कैसे लगाया जाए।

व्यापारी स्वाभाविक रूप से चाहता है कि भुगतान लेने में उसे अतिरिक्त खर्च न करना पड़े। ग्राहक भी यही चाहता है कि वह जितनी कीमत देख रहा है, उतनी ही रकम का भुगतान करे। अगर एमडीआर का बोझ सीधे व्यापारी पर आता है और व्यापारी उसे ग्राहक से वसूलने लगता है, तो बात धीरे-धीरे वहीं पहुंच सकती है जहां डिजिटल भुगतान के लिए अलग शुल्क और नकद भुगतान के लिए अलग कीमत तय होने लगे। इसका सबसे ज्यादा असर छोटे कारोबार पर पड़ेगा। और यही वह जगह है जहां सरकार को दूर की तस्वीर देखनी होगी।

अगर सरकार यूपीआई को रेट-फ्री बनाए रखती है और उसके संचालन की लागत किसी दूसरे माध्यम से समायोजित करती है तो इसे केवल सब्सिडी का खर्च मानना अधूरा हिसाब होगा। यूपीआई से नकदी पर निर्भरता घटती है। नकदी की छपाई, सिक्कों की ढलाई, पुराने नोटों की वापसी, करेंसी की सुरक्षा, भंडारण और परिवहन जैसी व्यवस्थाओं पर भी व्यवस्था को खर्च करना पड़ता है। डिजिटल भुगतान का विस्तार इन लागतों को पूरी तरह खत्म नहीं करता, लेकिन नकदी पर निर्भरता कम करने में जरूर मदद करता है।

इसके साथ एक और बड़ा फायदा है… लेन-देन का डिजिटल रिकॉर्ड। कारोबार का अधिक हिस्सा बैंकिंग व्यवस्था में आता है तो आर्थिक गतिविधियों की पारदर्शिता बढ़ती है। इससे औपचारिक अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ सकता है और कर अनुपालन को भी मदद मिल सकती है। यानी यूपीआई को मुफ्त रखने पर सरकार जो पैसा खर्च करती है, उसका कुछ हिस्सा दूसरे रास्तों से वापस आर्थिक व्यवस्था में आ सकता है। यह सीधा राजस्व नहीं है, लेकिन आर्थिक लाभ का ऐसा हिस्सा है जिसे नीति बनाते समय नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

इसलिए सरकार के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि यूपीआई चलाने में कितना खर्च आ रहा है। सवाल यह भी होना चाहिए कि यूपीआई के कारण अर्थव्यवस्था में कितना अतिरिक्त कारोबार औपचारिक हो रहा है, नकदी प्रबंधन पर कितना दबाव घट रहा है, छोटे कारोबारियों की बैंकिंग पहुंच कितनी बढ़ रही है और कर व्यवस्था को कितनी पारदर्शिता मिल रही है। इन सभी लाभों का एक साथ हिसाब लगाया जाए तो यूपीआई पर होने वाला सरकारी खर्च शायद खर्च कम और डिजिटल अर्थव्यवस्था में निवेश ज्यादा दिखाई दे।

बेशक इसका मतलब यह नहीं कि यूपीआई की लागत हमेशा सरकार ही उठाती रहे। व्यवस्था को टिकाऊ बनाने के लिए बैंकों, भुगतान सेवा प्रदाताओं और तकनीकी संस्थाओं की लागत का भी उचित मॉडल बनाना होगा। लेकिन ऐसा मॉडल जनता और छोटे कारोबारियों पर अचानक नया बोझ डालकर नहीं बनना चाहिए।

यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत उसकी सहजता है। इसे इस्तेमाल करने के लिए ग्राहक को यह सोचने की जरूरत नहीं पड़ती कि भुगतान पर कितना अतिरिक्त शुल्क लगेगा। यही भरोसा डिजिटल भुगतान की असली पूंजी है। अगर इसे बनाए रखने के लिए सरकार को कुछ खर्च कहीं और से समायोजित करना पड़े, तो उस खर्च को केवल बजट की एक मद के रूप में नहीं, बल्कि देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाले निवेश के रूप में देखने की जरूरत है।

आखिर यूपीआई का फायदा सिर्फ उस व्यक्ति को नहीं मिलता जो मोबाइल से भुगतान करता है। इसका फायदा व्यापारी को, बैंकिंग व्यवस्था को, कर प्रणाली को और पूरी अर्थव्यवस्था को मिलता है। इसलिए इसकी लागत का हिसाब भी केवल एक लेन-देन तक सीमित रखकर नहीं किया जा सकता। यूपीआई को मुफ्त और सहज बनाए रखना संभव हो, तो यह जनता को सुविधा देने के साथ-साथ सरकार के लिए भी दूरगामी आर्थिक लाभ का रास्ता खोल सकता है।