– Purnendu Pusshpesh
नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों को देखें तो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि को केवल सड़कों, योजनाओं, अर्थव्यवस्था या विदेश नीति के आंकड़ों में समेटना मुश्किल है। राष्ट्रवादी जनसमुदाय ही नहीं, आमलोग भी मानते हैं कि उन्होंने आम भारतीय के भीतर देश को लेकर एक नया आत्मविश्वास जगाया है। यह भावना कि भारत केवल विकास की दौड़ में शामिल देश नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपरा पर गर्व करने वाला राष्ट्र भी है; मोदी की राजनीति की एक प्रमुख पहचान बनी है।
गुजरात के मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक की उनकी यात्रा भारतीय राजनीति के लिए असाधारण रही है। 2014 के बाद शासन की शैली में बदलाव, बड़े फैसले लेने की राजनीतिक इच्छाशक्ति और योजनाओं को बड़े पैमाने पर लागू करने की कोशिशों ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रखा। स्वच्छ भारत, जनधन, उज्ज्वला, डिजिटल सेवाएं, बुनियादी ढांचे का विस्तार और गरीब कल्याण से जुड़ी अनेक योजनाओं ने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है। इन योजनाओं की उपलब्धियों के साथ उनके क्रियान्वयन और वास्तविक प्रभाव का आकलन भी लगातार जरूरी रहेगा।
मोदी के राजनीतिक व्यक्तित्व का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। भारतीय सभ्यता, सनातन परंपरा, योग, विरासत और राष्ट्रीय गौरव को उन्होंने सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में जगह दी। राम मंदिर से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय संस्कृति के उल्लेख तक, उनके कार्यकाल में सांस्कृतिक पहचान राजनीति और शासन की भाषा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी है। समर्थकों के लिए यह खोए आत्मविश्वास की वापसी है, जबकि आलोचक इस दृष्टिकोण के सामाजिक प्रभावों पर अलग सवाल उठाते हैं। लोकतंत्र में दोनों दृष्टियों पर चर्चा जरूरी है।
विदेश नीति के मोर्चे पर भी मोदी सरकार ने भारत की सक्रियता बढ़ाने पर जोर दिया। अमेरिका से लेकर पश्चिम एशिया, यूरोप, रूस और ग्लोबल साउथ तक भारत की कूटनीतिक मौजूदगी पहले से अधिक मुखर दिखाई दी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका और उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर मोदी की कार्यशैली ने व्यापक ध्यान खींचा है। उनकी लोकप्रियता के विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण भी चर्चा में रहे हैं, हालांकि ऐसे सर्वेक्षणों की पद्धति और सीमाओं को ध्यान में रखना चाहिए।
लेकिन 25 वर्ष किसी भी नेतृत्व के लिए केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का अवसर नहीं, आत्ममंथन का समय भी है। विकसित भारत का लक्ष्य तभी सार्थक होगा, जब विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सामाजिक सद्भाव, प्रशासनिक जवाबदेही और संस्थागत मजबूती जैसे सवाल अभी भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
विकसित भारत के लक्ष्य हेतु नौकरशाही में सुधार आवश्यक है। नौकरशाही की कार्यसंस्कृति में सुधार और सरकारी सेवाओं को अधिक संवेदनशील एवं जवाबदेह बनाना भी बड़ी चुनौती है। इनसे पार पाने के लिए सबसे अधिक आवश्यक यह है कि देश की नौकरशाही अपना रवैया बदले। ताकि, भ्रस्टाचार पर ज्यादा लगाम लग सके और नई पीढ़ी मे भारत की छवि और विकृत न हो पाए अपितु वह भी देश को और आगे बढ़ाने मे स्वयं को संलिप्त करे।
एक अत्यावश्यक तथ्य को स्वीकार करना होगा कि हर देश में ऐसे तत्व सक्रिय रहते हैं, जिनकी गतिविधियां राष्ट्र की एकता, सामाजिक सौहार्द और विकास की राह को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं। ऐसे तत्वों और उनके भ्रामक राष्ट्रविरोधी नैरेटिव से भारत को, विशेष रूप से देश की युवा पीढ़ी को, सचेत और सुरक्षित रखना आज बड़ी आवश्यकता है। इसके लिए ऐसा जागरूक और विवेकपूर्ण वातावरण बनाना होगा, जहां भारतीय नागरिक किसी भी भ्रामक प्रचार, आधी-अधूरी जानकारी या राष्ट्रविरोधी नैरेटिव को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय उसकी वास्तविकता को स्वयं समझ और परख सकें। देश की जनता और युवाओं में तथ्य, तर्क और राष्ट्रीय हित के आधार पर सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता मजबूत करना ही इसका सबसे प्रभावी रास्ता है।
मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत शायद यही होगी कि उन्होंने भारत को लेकर बहस का स्वर बदल दिया। अब सवाल केवल यह नहीं है कि भारत कितना विकसित होगा, बल्कि यह भी है कि विकास करते हुए वह अपनी पहचान और विरासत को किस तरह साथ लेकर चलेगा।
25 वर्षों के इस सफर का अंतिम मूल्यांकन इतिहास करेगा। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मोदी ने भारतीय राजनीति में अपनी ऐसी छाप छोड़ी है, जिसे नजरअंदाज करके आज के भारत को समझना संभव नहीं। आने वाले वर्षों में असली कसौटी यही होगी कि ‘विकसित भारत’ का सपना आर्थिक प्रगति के साथ आत्मविश्वासी, समावेशी और जिम्मेदार भारत में कितना बदल पाता है।

