– Purnendu Pusshpesh
लोकतंत्र में पत्रकारिता की ताकत उसकी आवाज की ऊंचाई से नहीं, बल्कि उसकी खबरों की विश्वसनीयता से तय होती है। सत्ता से सवाल पूछना उसका धर्म है, लेकिन सवाल पूछने के नाम पर तथ्यों की अनदेखी करना भी पत्रकारिता नहीं है। किसी सरकार की प्रशंसा करना और हर फैसले का विरोध करना, दोनों ही स्थितियों में पत्रकारिता के मूल उद्देश्य पर राजनीतिक सोच हावी होने का खतरा रहता है। आज चुनौती केवल मीडिया की स्वतंत्रता बचाने की नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की भी है। डिजिटल दौर में जब हर हाथ में कैमरा और हर व्यक्ति के पास अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने का मंच है, तब यह तय करना पहले से अधिक जरूरी हो गया है कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति, पेशेवर पत्रकारिता और राजनीतिक प्रचार के बीच अंतर क्या है। पत्रकारिता की आजादी पर कोई अनुचित अंकुश नहीं लगना चाहिए, लेकिन इस आजादी को जिम्मेदारी से अलग भी नहीं किया जा सकता।
डिजिटल तकनीक ने सूचना के प्रसार को तेज और व्यापक बनाया है। मोबाइल फोन के जरिए आम नागरिक भी घटनाओं को रिकॉर्ड कर सार्वजनिक कर सकता है। इससे कई ऐसे मुद्दे सामने आते हैं, जिन्हें पर्याप्त मीडिया कवरेज नहीं मिल पाता। लेकिन किसी घटना का वीडियो बनाना, उसे सोशल मीडिया पर डालना और तथ्यों की पुष्टि के साथ पूरी खबर तैयार करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। पत्रकारिता में केवल सूचना देना पर्याप्त नहीं; उसके स्रोत, संदर्भ, संबंधित पक्षों का जवाब और प्रकाशित सामग्री की जवाबदेही भी जरूरी है। व्यूज, लाइक्स और फॉलोअर्स किसी खबर की विश्वसनीयता का प्रमाण नहीं हैं।
इसीलिए सोशल मीडिया पर सक्रिय हर व्यक्ति को पेशेवर पत्रकार मानना और हर डिजिटल सामग्री को पत्रकारिता समझना उचित नहीं है। स्वतंत्र पत्रकार, फ्रीलांसर, समाचार संस्थानों के प्रतिनिधि और प्रचार या मनोरंजन के लिए सामग्री बनाने वाले लोगों की भूमिकाएं अलग हैं। इनका अंतर स्पष्ट होना चाहिए, लेकिन इसके नाम पर स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर अनुचित प्रतिबंध भी नहीं लगाया जा सकता। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जो पेशेवर जिम्मेदारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए।
पत्रकारों की पहचान और मान्यता का प्रश्न भी इसी से जुड़ा है। बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़े लोगों को ही पत्रकारिता का एकमात्र प्रतिनिधि मानना सही नहीं होगा। स्वतंत्र पत्रकार और फ्रीलांसर भी जनहित के गंभीर मुद्दों पर काम करते हैं। किसी बड़े संस्थान का पहचान पत्र नहीं होने मात्र से उनके काम और अधिकारों को खारिज नहीं किया जा सकता। मान्यता के नियम पारदर्शी हों और संवेदनशील स्थलों पर प्रवेश, सुरक्षा तथा पुलिस के व्यवहार के स्पष्ट मानक तय हों। इससे मनमानी की गुंजाइश कम होगी और वास्तविक पत्रकारों को अपना काम करने में सुविधा मिलेगी।
पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों और सोशल मीडिया सामग्री निर्माताओं की पहचान तथा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर एक गंभीर चर्चा होनी चाहिए। यह बहस इस बात की जरूरत रेखांकित करती है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए पेशेवर काम और सामान्य डिजिटल सामग्री के बीच अंतर कैसे तय किया जाए। इसके लिए जल्दबाजी में बनाए गए प्रतिबंधों के बजाय स्पष्ट, निष्पक्ष और पारदर्शी मानदंड जरूरी हैं। ऐसे मानदंड स्वतंत्र पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा करें, न कि उन्हें व्यवस्था से बाहर कर दें।
पत्रकारिता का राजनीतिक इस्तेमाल भी गंभीर चिंता का विषय है। राजनीतिक दलों को अपनी नीतियों और कार्यक्रमों का प्रचार करने का अधिकार है, लेकिन प्रचार को स्वतंत्र पत्रकारिता का विकल्प नहीं माना जा सकता। किसी प्रदर्शन या राजनीतिक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग करते समय आयोजकों के दावों के साथ प्रशासन का पक्ष, उपलब्ध तथ्य और आम लोगों पर पड़ने वाला प्रभाव भी सामने आना चाहिए। खबर का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उससे किस दल को फायदा हुआ या नुकसान।
सरकार और प्रशासन को भी आलोचना तथा असहमति के प्रति संयम बरतना होगा। किसी खबर से नाराज होकर पत्रकार को परेशान करना, उसके काम में बाधा डालना या पहचान संबंधी नियमों का मनमाना इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है। कानून सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए और उसकी प्रक्रिया भी निष्पक्ष रहनी चाहिए। दूसरी ओर, पत्रकारों को भी तथ्य-जांच, निजता, मानहानि और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़े मानकों का पालन करना होगा। स्वतंत्रता किसी को गलत सूचना फैलाने या बिना पुष्टि के आरोप लगाने का अधिकार नहीं देती।
पत्रकारिता की विश्वसनीयता न सरकारी कृपा से बनती है, न राजनीतिक विरोध से। उसका आधार तथ्य, निष्पक्षता, साहस और जनता के प्रति जवाबदेही है। स्वतंत्रता के बिना पत्रकारिता सत्ता से सवाल नहीं पूछ सकती और जिम्मेदारी के बिना जनता का भरोसा नहीं जीत सकती। इसलिए उद्देश्य किसी एक पक्ष को चुनना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था कायम करना होना चाहिए जिसमें पत्रकार निर्भय होकर काम करें, प्रशासन नियमों के अनुसार व्यवहार करे और मीडिया अपने प्रकाशित शब्दों के लिए जवाबदेह रहे। यही लोकतंत्र में स्वतंत्र और विश्वसनीय पत्रकारिता की असली कसौटी है।

