राष्ट्रीय हित सर्वोपरि, भारत अपने फैसले खुद करेगा

  • Purnendu Pusshpesh

भारत आज ऐसी स्थिति में है, जहां उसकी आर्थिक क्षमता, तकनीकी प्रगति और अंतरराष्ट्रीय भूमिका पर दुनिया की नजर है। ऐसे समय में देश की नीतियों और सरकार के फैसलों पर बहस होना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों से जुड़े फैसले बिना बाहरी दबाव के ले। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार की नीतियों का मूल्यांकन इसी आधार पर होना चाहिए कि वे देश की सुरक्षा, आर्थिक क्षमता और दीर्घकालीन विकास को कितना मजबूत करती हैं। किसी भी सरकार की आलोचना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन भारत के भविष्य का फैसला भारतीय नागरिकों और संवैधानिक संस्थाओं के दायरे में ही होना चाहिए।

मोदी सरकार को जनता ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से चुना है। उसकी नीतियों से असहमति रखने वाले दलों को जनता के सामने अपने विकल्प रखने चाहिए। संसद, चुनाव और सार्वजनिक बहस इसके लिए उपलब्ध मंच हैं। यदि विपक्ष सरकार को चुनौती देना चाहता है तो उसे रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास जैसे मुद्दों पर ठोस कार्यक्रम पेश करना होगा। केवल सरकार के विरोध से जनता का भरोसा हासिल नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में सरकार की सफलता और विपक्ष की प्रासंगिकता, दोनों का फैसला अंततः जनता करती है।

भारत की विदेश नीति भी इसी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़नी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों पर अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन उनकी टिप्पणियां निष्पक्षता और समान मानदंडों पर आधारित होनी चाहिए। यदि किसी संस्था का रवैया चुनिंदा देशों के प्रति अलग दिखाई देता है, तो भारत सरकार का उस पर सवाल उठाना उचित है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपने संस्थागत अनुभव और संवैधानिक व्यवस्था के बारे में अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग का अर्थ यह नहीं कि भारत अपनी नीतियां बाहरी दबाव के अनुसार तय करे।

तकनीक और कारोबार के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना आवश्यक है। एलन मस्क की स्टारलिंक जैसी विदेशी कंपनियां भारतीय बाजार में अवसर तलाश रही हैं। भारत निवेश और आधुनिक तकनीक का स्वागत करता है, लेकिन किसी भी कंपनी को यहां काम करने के लिए निर्धारित कानूनी, नियामक और सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी करनी होंगी। बड़े कारोबारी समूहों को विशेष छूट देना न तो भारतीय उद्यमियों के हित में है और न ही स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के। सरकार की जिम्मेदारी है कि घरेलू और विदेशी कंपनियों के लिए स्पष्ट तथा निष्पक्ष नियम सुनिश्चित करे। इससे निवेशकों को भरोसा मिलेगा और देश की डिजिटल सुरक्षा भी मजबूत होगी।

आर्थिक आत्मनिर्भरता का सवाल भी इसी से जुड़ा है। भारत को अपनी तकनीकी जरूरतों, संचार व्यवस्था, रक्षा उत्पादन और महत्वपूर्ण उद्योगों में घरेलू क्षमता बढ़ानी होगी। विदेशी निवेश उपयोगी है, लेकिन किसी एक बाहरी कंपनी या देश पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकाल में जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए सरकार की नीतियों का उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए, जिसमें भारतीय कंपनियां शोध, नवाचार और उत्पादन के क्षेत्र में आगे बढ़ें। राष्ट्रीय हित और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को मजबूत करने वाले लक्ष्य हैं।

सरकार के आलोचकों को भी यह समझना होगा कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर किसी विदेशी नेता या कारोबारी की टिप्पणी अपने आप में अंतिम सच नहीं होती। आर्थिक प्रदर्शन का आकलन विश्वसनीय आंकड़ों, रोजगार के अवसरों, निवेश, उत्पादन और आम नागरिक के जीवन में हुए बदलावों से किया जाना चाहिए। सरकार की उपलब्धियों को सामने रखना जरूरी है, लेकिन चुनौतियों को स्वीकार कर उनके समाधान पर काम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विकास का वास्तविक लाभ तभी व्यापक होगा, जब आर्थिक अवसर समाज के अधिक से अधिक वर्गों तक पहुंचेंगे।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक असहमति को संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रखा जाए। सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है और यह अधिकार चुनाव के माध्यम से इस्तेमाल होता है। हिंसा या रक्तपात की भाषा लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है। किसी भी दल या विचारधारा को सत्ता हासिल करने के लिए संवैधानिक रास्ते से हटने का समर्थन नहीं करना चाहिए।

भारत का आत्मविश्वास उसकी जनता, लोकतांत्रिक संस्थाओं, वैज्ञानिक क्षमता और आर्थिक संभावनाओं से आता है। मोदी सरकार की नीतियों पर बहस होनी चाहिए, लेकिन उस बहस का केंद्र भारतीय नागरिकों का हित होना चाहिए। विदेशी सहयोग का स्वागत हो, पर राष्ट्रीय नीतियों पर अंतिम निर्णय भारत का हो। यही संप्रभुता का अर्थ है और यही एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र की पहचान भी।