देश ने नकारा अराजकता का एजेंडा, अब राष्ट्रहित के साथ खड़े होने का समय

– Purnendu Pusshpesh


10 अक्टूबर को CJP के तथाकथित आंदोलन के दौरान जो तस्वीर सामने आई, वह उन लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो चंद नारों, सोशल मीडिया के शोर और राजनीतिक प्रचार को पूरे देश की आवाज समझ बैठते हैं। देश हर मुद्दे पर सड़कों पर उतरने वालों के साथ नहीं होता। देश यह भी देखता है कि आंदोलन किसलिए हो रहा है, उसके पीछे कौन-सी सोच काम कर रही है और उससे भारत का भला होगा या नुकसान। CJP के आंदोलन को लेकर उठी आलोचनात्मक आवाजों को इसी जनमानस की अभिव्यक्ति के रूप में समझने की जरूरत है। सवाल केवल किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रवृत्ति का है जो विरोध के नाम पर देश में अविश्वास और अस्थिरता का वातावरण बनाने में लगी दिखाई देती है।

आज देश का एक बड़ा वर्ग यह सवाल पूछ रहा है कि आखिर हर संवैधानिक संस्था पर अविश्वास पैदा करने, चुनावी प्रक्रिया को संदिग्ध बताने और सरकार के हर कदम को गलत ठहराने की इस मुहिम का अंतिम उद्देश्य क्या है? CJP, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच दिखाई देने वाली राजनीतिक समानताओं तथा उनके बयानों और अभियानों के तालमेल पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इन दलों और संगठनों पर विदेशी ताकतों के इशारे पर काम करने जैसे गंभीर आरोपों को प्रमाणों के आधार पर ही परखा जाना चाहिए, लेकिन इतना तय है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने वाली किसी भी कोशिश के प्रति देश को सजग रहना होगा। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन देश की स्थिरता और प्रतिष्ठा से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

लोकतंत्र का अर्थ यह कतई नहीं है कि कोई भी संगठन जब चाहे, जितनी चाहे भीड़ जुटाकर देश की संस्थाओं के प्रति अविश्वास फैलाने लगे और अपने हर आरोप को जनता की आवाज बताने लगे। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन सवालों के साथ तथ्य भी होने चाहिए। चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाया जाता है, तो प्रमाण प्रस्तुत किए जाने चाहिए। किसी संस्था की कार्यप्रणाली पर आपत्ति है, तो उसके समाधान का संवैधानिक रास्ता अपनाया जाना चाहिए। बिना ठोस सबूत के लगातार आरोप लगाना और फिर उन आरोपों को ही आंदोलन का आधार बना देना जनहित नहीं, बल्कि जनता के मन में संदेह पैदा करने की राजनीति है।

10 अक्टूबर के आंदोलन को अपेक्षित जनसमर्थन न मिलना, यदि यही वास्तविक स्थिति रही, तो इसके आयोजकों को समझना चाहिए कि देश केवल प्रचार से प्रभावित नहीं होता। जनता अब यह भी देखती है कि आंदोलन के पीछे कौन खड़ा है, उसकी भाषा कैसी है और उसका लक्ष्य क्या है। हर विरोध को ऐतिहासिक जनांदोलन बताने से वह जनांदोलन नहीं बन जाता। जनता का विश्वास अर्जित करना पड़ता है। केवल कुछ नारों, कैमरों और इंटरनेट मीडिया की हलचल से पूरे राष्ट्र की भावना का प्रतिनिधित्व नहीं किया जा सकता। देश की चुप्पी को भी समझना होगा और विरोध की आवाजों को भी सुनना होगा।

इस संदर्भ में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का 1974 का आंदोलन विशेष रूप से याद आता है। जेपी ने युवाओं के असंतोष को दिशा दी थी, उसे अनुशासन और नैतिकता से जोड़ा था। उनका आंदोलन केवल सत्ता के विरोध का माध्यम नहीं था, बल्कि व्यवस्था में व्यापक सुधार का प्रयास था। उन्होंने अहिंसा और अनुशासन पर जोर दिया तथा आंदोलन को किसी संकीर्ण दलीय स्वार्थ में सिमटने से बचाने की कोशिश की। आज जेपी के नाम का इस्तेमाल करने वालों को भी उनके आदर्शों पर खरा उतरना होगा। केवल नाम और नारे उधार लेने से कोई आंदोलन जेपी आंदोलन की बराबरी नहीं कर सकता। उसके लिए त्याग, नैतिक साहस, स्पष्ट उद्देश्य और राष्ट्र के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता चाहिए।

आज भारत एक ऐसे दौर में आगे बढ़ रहा है, जब दुनिया की निगाहें उसकी आर्थिक प्रगति, तकनीकी क्षमता, सामरिक शक्ति और बढ़ते वैश्विक प्रभाव पर हैं। ऐसे समय में देश के भीतर अनावश्यक अस्थिरता पैदा करने वाली राजनीति से सावधान रहना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार की आलोचना बंद कर दी जाए। इसका अर्थ केवल इतना है कि आलोचना देश को बेहतर बनाने के लिए हो, उसे कमजोर करने के लिए नहीं। सरकार बदल सकती है, राजनीतिक दल आते-जाते रहेंगे, लेकिन भारत की प्रतिष्ठा, एकता और लोकतांत्रिक स्थिरता हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।

इसलिए आज आवश्यकता है कि देशवासी राजनीतिक प्रचार और वास्तविक जनहित के बीच अंतर करें। किसी भी संगठन या दल के दावों को आंख मूंदकर स्वीकार न करें। तथ्यों को परखें, देशहित को सर्वोपरि रखें और ऐसी हर प्रवृत्ति का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करें जो समाज में भ्रम, कटुता और अस्थिरता बढ़ाती हो। युवाओं को भी अपनी ऊर्जा ऐसे आंदोलनों में लगाने से पहले उनके उद्देश्य और परिणाम पर विचार करना चाहिए।

भारत किसी राजनीतिक दल का नहीं, सवा सौ करोड़ से अधिक नागरिकों की साझा विरासत है। इसकी शक्ति इसकी एकता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनता के विश्वास में है। राष्ट्रहित के प्रश्न पर हमें दलगत स्वार्थ से ऊपर उठना होगा। विरोध का अधिकार सुरक्षित रहे, लेकिन विरोध की आड़ में देश को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को स्वीकार न किया जाए। आज समय की मांग यही है कि हम भ्रम और प्रचार के बजाय विवेक का साथ दें, राजनीतिक स्वार्थ के बजाय राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दें और पूरे आत्मविश्वास के साथ भारत की एकता, स्थिरता तथा प्रगति के पक्ष में खड़े हों।